जनता से दूर होते जननेता

सन्दर्भ : फ्लाइट में देरी 
  


पद उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी मानवीयता. आप या हम सब हाड मांस के बने हैं और जिसने जन्म लिया उसका मरण निश्चित पर पदासीन होने के उपरांत किसी को, किसी के कारण दुःख पंहुचे वह उचित नहीं. आप कितने ही बड़े पद पर हों, वह अपनी जगह है, लेकिन मानवता उसके पहले है.

                                                       @ डॉक्टर अरविन्द जैन, भोपाल 

एक गरीब लड़का अपनी झोपड़ी में लेटा था कि उसे सपना आया कि वह अपने राज्य का राजकुमार बन गया और राजा का पुत्र होना बड़े सौभाग्य की बात होती है. सपना पर किसी का कोई बंधन तो नहीं होता और न किसी का पेटेंट होता. राजकुमार ने उम्र पाकर अपने गांव के सामान्य परिवार की लड़की से शादी की, कारण, उसने सोचा यह राजकुमार का पद कभी भी जा सकता है. अपनी हैसियत से रहकर शादी करो, शादी होना निश्चित हुआ तो पहले वर्ष में ही राजकुमार पिता बन गया और पत्नी और बच्चा उसके घर पर रह रहे थे और राजकुमार महल में. समय बीता और वह राजा बन गया और अब उसने अपनी पत्नी और बच्चे को पहचानना भूल गया. राजा बनने के बाद उसका रुआब कुछ तेज़ हुआ और अचानक उसकी नींद खुली तो वह अपने झोपड़े में था, पर सपना याद रहा कि उसे पहले राजकुमार तो बनना है.

गरीब को पहले सपना देखने का भी अधिकार नहीं था, पर राजशाही ख़तम होने पर जनतंत्र आया तो सबको मौका मिलने लगा. और उस राजकुमार ने जनतंत्र में रहकर, कुछ पढ़ लिखकर ऐसे गुट से जुड़ गया, जिससे उसे काम मिल गया. उसको देश जागरण और प्रेम की अलख जगाना था और उसने जगाया. उसने सपने को वास्तविकता में बदला, उसने एक सूत्र अपने जीवन में उतार लिया कि मुझे सत्ता के विरोध में काम करना है और उसने सत्ता की विरोध में बिगुल बजाया और वह जीवंत हो उठा.

समय परिवर्तन शील हैं और राजनीति समय पर निर्भय करती है. राजनीति की योग्यता पहली चापलूसता यानि किसी का वरदहस्त मिलना या होना, आयुर्वेद में पंचकर्म चिकित्सा है, जिसमें स्नेहन यानि तेल लगाना और फिर स्वेदन करना यानि पसीना निकालना, चिकित्सा के पूर्व कर्म होते हैं, जो राजनीति में सबसे अधिक उपयोगी हैं. आप जिस किसी भी नेता के प्रति समर्पित हों, उसे सबसे पहले तेल लगाना पड़ता है यानि चापलूसी करना होती है यह प्रथम सोपान है.

जब किसी का आशीर्वाद प्राप्त होता है, तब टिकट की ओर टकटकी लग जाती है. और वह टिकट पाने पर जनता के पास जाता है, यह प्रथम चरण होता है चुनाव का. चुनाव जीतने के बाद चुनाव का दूसरा चरण जनता उसके चरण ढूढ़ती है. इसके बाद उसका जनता से सम्पर्क टूटने लगता है. वह विशिष्ठ हो जाता है. भूतपूर्व प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी बाजपेयी ने अपना पद प्राप्त करने के बाद कहा था कि इस पद पर आने के बाद अपने निजियों से भी मिलना कठिन है, तब अन्यों से क्या अपेक्षा करें? जिस जनता से चुनकर जननेता बने, वे जनता से बहुत दूर हो जाते हैं. पद के पूर्व का अहसास ख़तम हो जाता है. इसके दो तीन कारण हैं पहला सुरक्षा, दूसरी व्यस्तता और तीसरा वृहद कार्य क्षेत्र का होना.

इसके बाद भी पद मिलने के बाद क्या वे मानवीय गुणों को भूल जाते हैं या मानवीयता से दूर हो जाते हैं या क्या ऐसा संभव है कि वे असामाजिक हो जाते हैं. यह हमेशा याद रखना चाहिए कि ये पद बहुत अस्थायी होते हैं. जैसे संविदा शिक्षकों की स्थिति या अन्य कर्मचारियों की जो अस्थायी हैं. प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के पद बहुत अस्थायी होते हैं और दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं और दया के पात्र होते हैं. यदि बहुमत नहीं है तो दोनों डावांडोल होते रहते हैं. पद के साथ जो सत्ता या शक्ति का भाव आता है वह शोषक का प्रतीक होता है. उस समय पदासीन पद के कारण या शक्ति के कारण वह एक सीमित दायरे में रहकर असीमित नहीं होता. क्या यह उसकी गुलामी का प्रतीक नहीं होता? वह सत्ता से ऐसे बंध जाता है कि उसे जनता से कोई प्रत्यक्ष मतलब नहीं रहता. जैसे हम लोग मोबाइल के कारण वास्तविक दुनिया में न रहकर काल्पनिक दुनिया में रह रहे हैं.

कल इम्फाल हवाई अड्डे पर एक यात्री को समय पर यात्रा करने का अवसर नहीं मिला ऐसा क्यों? जो जनता से चुने प्रतिनिधि जनता की आवाज़ को नज़रअंदाज़ कर गए. मानवीयता का कोई स्थान नहीं नियमों के सामने? यह समस्या भारत या इंडिया में बहुत प्रचलित है. कोई भी महामहिम या प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री या राज्यपाल कही भी जाए, उनकी सुरक्षा व्यवस्था इतनी चाकचौबंद होती है कि कोई पंछी भी पर नहीं मार सकता. इस व्यवस्था में जिसके द्वारा चुने गए जनता बहुत कष्टदायक महसूस होने लगती है. कितनी सुरक्षा जैसे अभेद्य किला हो, पर आम जनता को कितनी असहनीय पीड़ा को सहना पड़ता है, उसका अहसास करना चाहिए जब आप भी आम नागरिक थे और तत्समय की व्यवस्था पर आपकी क्या प्रतिक्रिया रही होगी.

काल्पनिक दुनिया से निकल कर वास्तविक दुनिया में आकर कोई समाधान ढूढना चाहिए. आपके साथ यदि कोई इस प्रकार की घटना घटे तो आपकी प्रतिक्रिया कैसी होगी? पद उतना महत्वपूर्ण नहीं हैं जितनी मानवीयता. आप या हम सब हाड मांस के बने हैं और जिसने जन्म लिया उसका मरण निश्चित पर पदासीन होने के उपरांत किसी को, किसी के कारण दुःख पंहुचे वह उचित नहीं. आप कितने ही बड़े पद पर हों, वह अपनी जगह है, लेकिन मानवता उसके पहले है.

हर सिक्के के दो पहलु हैं और दोनों सही हैं या होंगे, पर आप एक सामान्य नागरिक के नाते सोचें कि क्या गलत या क्या सही. विपत्ति में मनुष्य का एक एक पल कठिन होता है और उसमें किसी ऐसे कारण से विलम्ब होना क्या उचित है? चिकित्सा क्षेत्र में समय का मूल्य बहुत अधिक है दूसरा किसी की मृत्यु में हम प्रथम प्राथमिकता देते है, जो नहीं हुआ.

यह विषय किसी को अप्रिय लग सकता है, पर जिस पर बीतती है वही उस पीड़ा को जानता है, जैसे सापेक्षता का नियम है कि कोई व्यक्ति अपनी प्रेमिका के साथ रहता है तो उसे चौबीस घंटे एक घंटे के बराबर लगते हैं और उसी को गर्म तवे पर बैठाया जाय तो एक मिनिट एक घंटे के समान लगता है. इन व्यवस्थाओं पर पुनर्विचार किया जाना उचित होगा. 

नियम सब बने हैं इसलिए कि हम बने रह सकें
पर होता यह है हम टूटते चले जाते हैं और नियम बने रहते हैं.. 
शाकाहार परिषद् भोपाल

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News Digital India 18

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