न्यूजप्रिंट पर GST : छोटे, मध्यम अखबारों को खत्म करने का षड़यंत्र




वर्तमान सरकार ने न्यूजप्रिंट पर GST लगा दिया है, जिसके कारण अखबारों पर भारी बोझ पड़ा है. जिन प्रकाशकों ने अपना प्रसार कम किया है, उनसे वसूली क्यों नहीं किया जाय, इस आशय का नोटिस डीएवीपी ने जारी कर दिया है. डीएवीपी के इतिहास में ऐसा पहली बार देखने में आ रहा है. कहा जा रहा है सरकार द्वारा छोटे और मध्यम अखबारों को खत्म करने का षड़यंत्र किया जा रहा है. 
जानकारों का कहना है कि सरकार की डीएवीपी पॉलिसी 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबार बंद होने की कगार पर हैं। छोटे अखबार मालिकों के मुताबिक यह समय छोटे और मध्यम अखबारों के लिए अब तक का सबसे कठिन समय है। डीएवीपी की नई विज्ञापन नीति को दमनकारी बताने वाले छोटे अखबार मालिकों का कहना है जीएसटी ने प्रिन्ट मीडिया की जान लेना शुरू कर दिया है।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार संजय कुमार सिंह लिखते हैं कि डीएवीपी की संशोधित विज्ञापन नीति से सैकड़ों अखबार पहले ही बाहर हो चुके हैं। 1 जून 17 से नई विज्ञापन नीति लागू कर डीएवीपी ने कइयों का गला घोंट दिया। अब तक डीएवीपी के सदमे से छोटे अखबार बाहर आये ही नही कि जीएसटी जैसे कानून ने इन अखबारों की जान खतरे मे डाल दी। न्यूज पेपर छापने वाली प्रिन्टिंग मशीन पर 5 प्रतिशत, विज्ञापनों पर 5 प्रतिशत और न्यूज प्रिन्ट पेपर खरीदने पर 5 प्रतिशत जीएसटी का प्रावधान हैं। हकीकत यह है कि राज्य एवं केन्द्र सरकार से कुल मिला कर छोटे अखबारों को सालाना एक से डेढ लाख का औसत विज्ञापन भी नहीं मिलता है। उसपर जीएसटी पंजीकरण की बाध्यता इन अखबारों को मार डालेगी।


छोटे अखबार वाले अगर चोर हैं तो बड़े वाले पूरे डकैत

नोएडा से छपने वाले अखबार एनसीआर टुडे के एडिटर संजय शर्मा ने शेयर किया है कि केंद्र सरकार की प्रिंट मीडिया विज्ञापन नीति 2016 को लेकर लघु और मध्यम अखबारों के प्रकाशक लगातार लड़ाई लड़ रहे है। इस लड़ाई के तहत हम लोगों के द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट में कई याचिका दायर की जा चुकी है। मध्य प्रदेश में बीते वर्ष आयोजित एक याचिका के बाद डीएवीपी के कुछ अधिकारी लघु और मध्यम अखबारों को फर्जी साबित करने और नीति को सही ठहराने के प्रयास में जुटे है।
उन्होंने लिखा है कि अगर कुछ देर के लिए यह मान भी लिया जाए कि लघु और मध्यम अखबारों में खामियां है तो क्या बड़े अखबारों में नहीं है? बिना इम्पेनलमेन्ट के बड़े अखबारों को विज्ञापन देना, दैनिक अखबार के लिए जारी विज्ञापन साप्ताहिक अखबार में प्रकाशित करना… इसके अलावा अभी 4 दिन पहले प्रधानमंत्री जी के फोटो वाले विज्ञापन सरकार के तीन साल पूरे होने के अवसर पर देश के सभी अखबारों में छापे गए… यह विज्ञापन जैकिट पर प्रकाशित क्यों हुए… क्या कोई बतायेगा कि इन विज्ञापनों का पेज नंबर क्या है… क्या यह डकैती और सरकारी धन का दुरुपयोग नहीं है…
विज्ञापन कई दिन से लगातार जारी किए जा रहे हैं। मीडिया लिस्ट रिपीट हो रही है। सारे विज्ञापन एक ही लिस्ट के आधार पर जारी किए गए। क्या इसमें रोटेशन नहीं होना चाहिए। इस सब के बावजूद सरकार की नीति बहुत बढ़िया है। मैं ऐसे कई बड़े अखबारों को जानता हूं जिनकी ऑन रिकार्ड प्रसार संख्या लाख में है, पर असलियत में वह 10 हजार भी नहीं छपते। इस सब के बावजूद डीएवीपी के अधिकारी बहुत ईमानदार हैं।
डीएवीपी के हर अधिकारी की एक अपनी लिस्ट होती है। आखिर क्यों? जो हुआ उसमें अधिकारियों की लिप्तता से इनकार सरकार को नहीं करना चाहिए। पर नजर केवल एक तरफ है… यह तो ठीक नहीं है। छोटे अखबार वालों को चोर और बड़े वालों को डकैत कहा जाना चाहिए। 


डीएवीपी यह स्प्ष्ट करे

छोटे और मध्यम अखबारों के प्रतिनिधि इस सम्बंध में डीएवीपी से जानना चाहते हैं कि क्या वह यह स्प्ष्ट करेगा कि 
1. डीएवीपी पॉलिसी के किस नियम के तहत यह वसूली का नोटिस दिया गया है। इसमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि प्रसार कम करने पर पिछले साल की वसूली की जाय। डीएवीपी Policy Clause- 25 देखा जा सकता है।
2. भविष्य में अगर कोई अखबार का प्रसार बढ़ता है तो क्या डीएवीपी की तरफ से पिछले साल से बढ़े हुए दर का डिफरेंस दिया जाएगा क्योंकि प्रसार पिछले साल के रिटर्न दाखिल करने के साथ उनके आधार पर रेट बढ़ता है, सर्कुलेशन चेकिंग होता है।
3. डीएवीपी POLICY clause-22 के अनुसार 30 दिनों के अंदर भुगतान करना होता है, 30 दिन के अंदर कोई भी भुगतान नहीं किया गया है अतः जितने भी दिन की देरी हुई है उस पर18% ब्याज दिया जाय।
4. 1 जून से वैसे अखबार जिनका रेट दिया जाना था, उसमें बहुतों को आजतक दर नहीं मिला है या मिलने के बाद ब्लॉक किया हुआ है. क्या उनको डीएवीपी छतिपूर्ति देगा क्योंकि वैसे अखबारों का विज्ञापन डीएवीपी के कारण हर जगह से बंद पड़ा है।
5. प्रकाशक को वर्तमान वित्तीय वर्ष में भी प्रसार कम करने पर डीएवीपी तुरंत दर कम करने का नियम बना दे क्योंकि एक साल के बाद कोई रिटर्न फाइल करने में दर कम करने पर हमेशा रिकवरी करने की जरूरत पड़ेगी।
6. डीएवीपी policy Clause- 3 के अनुसार भारत सरकार के सभी विज्ञापन डीएवीपीके द्वारा जारी किया जा सकता है.. सिर्फ कुछ टेंडर अन्य विभाग स्वयं जारी कर सकते हैं, वो भी डीएवीपीदर पर, जिसका पालन नहीं हो रहा है.. साथ ही विज्ञापन छोटे को 15%, मध्यम को 35% और बड़े अखबार को 50% अधिकतम रुपये की टर्म्स पर देना है परन्तु इसका पालन नहीं हो रहा है.. 50% की जगह 60%- 80% बड़े अखबारो को जा रहा है.. साथ ही डीएवीपी Policy Clause- 19 के अनुसार अंग्रेजी 30%, हिंदी 35% स्थानीय और अन्य भाषा के अखबार के बीच 35% विज्ञापन का बंटवारा होना चाहिए, जिसका पालन नहीं हो रहा है।
7. डीएवीपी Policy Clause- 16 के अनुसार RNI / ABC अखबारों को पहले से पांचवे पन्ने या अंतिम पन्ने पर विज्ञापन छापने पर 10% से 50% प्रीमियम देना है परन्तु आजतक किसी को भी नहीं मिला है।
8. डीएवीपी Policy Clause- 18 (ll) जो बड़े अखबार शैक्षणिक विज्ञापन डीएवीपीदर पर छापने की सहमति देते हैं उन पर उसे 50% अधिक विज्ञापन दिया जाएगा, जिसने सहमति नहीं दिया है उसके अनुपात से मिलेगा, लगभग सभी बड़े अखबार ने सहमति नहीं दी है, जिसका पालन नहीं हो रहा है।
9. 2016 से बहुत से बड़े अखबारो लगभग सभी का ABC कम हुआ है परन्तु उनसे कोई वसूली नहीं की जा रही है जबकि नियम सबके लिए एक समान लागू होता है।

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