नन्हें बच्चों पर भारी बस्ते, शिक्षा व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह





आज हम सब यह देख रहे हैं कि हमारे नौनिहाल बचपन खोते जा रहे हैं. यह हम सबके लिए यह बेहद विचारणीय विषय है. यह भी आप हम सब अच्छे से समझते हैं कि इसके लिए प्रमुख रूप से हमारी दिशाविहीन शिक्षा प्रणाली जिम्मेदार है. आए दिन पाठ्यक्रम में परिवर्तन या बदलाव, नित नए शिक्षा नीति पर प्रयोग किये जा रहे हैं, लेकिन कोई बच्चा बड़ा होकर किस प्रकार से बेहतर जिन्दगी जी सके, के मामले में बात करें तो शिक्षा का जो कि यही उद्देश्य होता है, और होना चाहिए, यह सामने नहीं आता. इससे शिक्षा की पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लग रहा है. 

मानवीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो 6 केजी से कम ही बोझ होना चाहिए. छोटे बच्चों पर यह 6 केजी भी अधिक ही है. बेवजह अनावश्यक विषयो पर रोक लगाकर और बच्चों को स्कूल में सेल्फ की व्यवस्था कर, बच्चों को आवंटित कर यह आसानी से कम किया जा सकता है. साथ ही मैदानी खेल कूद, प्रयोगात्मक विषय, आर्ट, क्राफ्ट के विषय पर जोर दिया जाना ज्यादा जरूरी है. नियमित टाइम टेबिल के अनुसार विषय रखें जाएं तो इससे भी निश्चित ही भारी बस्ते से निज़ात मिलेगी. 

पर इस तरफ ठीक से नहीं सोचा जा रहा. शिक्षा प्रणाली महज़ डिग्री हथियाने का साधन मात्र बन कर रह गई है. पढ़ाई में पहले जैसी गुणवत्ता भी नहीं रही. निजीकरण के इस दौर में बस्तों का बोझ बढ़ता जा रहा है और नतीजा बच्चों में मानसिक तनाव की वृद्धि, प्रतिस्पर्धा, ब्रांड स्कूलों का बढ़ता क्रेज़, यह सभी मुद्दे भी विचारणीय हैं. प्रतिस्पर्धा की होड़ और बढ़ता पाठ्यक्रम बढ़ते नए विषयों पर रोक जरूरी है.

बारहवीं पंचवर्षीय योजना के तहत मेक इन इंडिया पर जोर, स्कूल इंडिया मिशन व्यवस्था को एक निमार्ण हब बनाने में और रोज़गार सृजन एक बेहतरीन सृजन है, साथ में केन्द्रीय विद्यालयों की स्कूल श्रृंखला ने एक बेहतरीन पहल की, कि बच्चों का बस्ता और उसका बोझ कैसे कम किया जाए, पर सिर्फ बात की गई. यह भी कहा गया कि बस्ते का बोझ कम से कम 6 केजी या इससे कम हो, लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी.

डिजिटल इंडिया और अंग्रेजी माध्यम की वजह से अभिभावक भी एक ऐसी स्पर्धा में कूद पड़े हैं, जिसका कोई अंत नहीं. अध्ययन में पता चलता है कि उन्हें बच्चों की शिक्षा से ज्यादा अपने स्टेटस सिंबल की फ़िक्र है. सरकारी स्कूलों का स्तर किसी से छुपा नहीं है. इनका स्तर इतना गिरा है कि आज देश में लगभग साढे तीन लाख ऐसे सरकारी स्कूल सरकार बंद करने जा रही है. अभिभावकों पर निजी विद्यालयों का व्यय भारी पड़ रहा है, जो वास्तव में दयनीय और सोचनीय भी है. ऐसे में आवश्यक हो गया है कि गुरुकुल जैसे शिक्षा संस्थानों की पुनः स्थापना हो. 

लम्बे समय से हम हम यह तो कहते सुनते आ रहे हैं कि 'आज का बच्चा कल का भविष्य हैं.  इन्हें बस्तों के बोझ से बचायें और बचपन जीने दें, तभी एक शिक्षित भारत की नींव मजबूत होगी', लेकिन इसके लिए क्या प्रयास किये गए या किये जा रहे हैं, तो पता चलता है कि सिर्फ बातें. ऐसा नहीं चलेगा. इसके लिए हमें धरातल पर इस दिशा में काम करना होगा. निश्चित ही इन उपर्युक्त मुद्दों पर ध्यान दिया जाए, तो हम अपने बच्चों पर बस्तों का बोझ कम करके उनके सम्पूर्ण विकास पर सही मायने में ध्यान दे पाएँगे और उचित शिक्षा प्रणाली की दिशा में सुधार कर पाएँगे. 

@ सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ 


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