कुछ दिन बाद मामला कहता है 'मैं ही मर जाता हूँ'


घटना होती है, हम सब उसको लेकर किसी न किसी को दोषी ठहरा का दूर हो जाते हैं. सरकार जांच बिठा कर अपने दायित्व से मुक्त हो जाती है. समस्या वहीँ की वहीँ रहती है, क्योंकि हम उसके मूल में जाकर उसका स्थाई समाधान नहीं करते. यह नहीं कह रहे कि जिम्मेदारों को फांसी पे लटका दो, लेकिन यह तो देखा जाना चाहिए कि चूक कहाँ हो रही है. कहाँ जाना था और कहाँ जा रहे हैं.  
एक व्यक्ति, एक मनुष्य के नाते हमारे क्या कर्तव्य हैं, इसे लगभग हम सब ही भुला चुके हैं. इसी का परिणाम है कि लगभग हम सब किसी न किसी समस्या से ग्रस्त हैं और उनसे जूझ रहे हैं. और ऐसा हमारी अज्ञानता के कारण है. 
हाल में भोपाल की घटना कोई नई बात नहीं है, यह सब अब हमारे जीवन में आम हो गया है. किसी ने राजा भोज के चित्र के साथ यह लिखकर कि 'बेटी मैं शर्मिन्दा हूँ' अपना कर्तव्य पूरा कर लिया, किसी ने कुछ. जिम्मेदारों ने घटना को दुखद बताया, सरकार ने कहा लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया, जांच बैठा दी. विपक्ष ने भी अपना कर्तव्य इस्तीफा मांग कर पूरा कर लिया. सब अपना अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हैं. पर यहीं गलती हो रही है. असल में हमारे कर्तव्य क्या हैं, हमें यही नहीं पता. 
दुखद ये है कि लोग चुप हैं. कहा जा रहा है उनका जमीर मर गया है. घटना के खिलाफ जनता का गुस्सा दिखना चाहिए था, वह नहीं दिखा. सच यह है कि लोगों ने अत्याचार सहन करना सीख लिया है. आँख बंद कर रेल की पटरी पर चल रहे हैं. उन्हें ये भी पता है कि टपक सकते हैं, लेकिन वह मानते हैं तब का तब देखा जाएगा, हो सकता है कुछ न हो और हम पटरी पार कर जाएँ. दुसरे की, आस पास की, किसी की कोई समस्या में उसके साथ खड़े होने, लड़ने में सहयोग करने, अब उनके पास कोई समय नहीं है. व्यवस्था ही कुछ इस प्रकार की बन गई है. वह भी क्या करें. उन्हें पता है कुछ नहीं होगा. सभी को पता है पुलिस राजनैतिक दबाव में काम करती है. 
FIR न करने के पीछे आंकड़ों को नियंत्रित करने वाली बात है. इसी से पता चलता है अपराध कम हो रहे हैं या बढ़ रहे हैं, चूंकि अपराध कम होना दिखाना है तो FIR कैसे हो? पुलिसिया कार्यप्रणाली की जानकारी होने के चलते ज्यादातर मामले आते ही नहीं हैं, और जो आते हैं उनमें से भी ज्यादातर शिकायती पत्र लेकर चलता कर दिया जाता है, यह सब जानते हैं. FIR का हौवा खड़ा कर दिया गया है. FIR का फुलफार्म और वह भी हिन्दी में शायद हम नहीं जानते. न ही हमें कोई बताना चाहता, फर्स्ट इन्फार्मेशन रिपोर्ट यानि प्राथमिकी. आज अपराध होने पर यही दर्ज कराना बड़ा काम हो गया है. लगता है अरे वाह! अब तो.... जहाँ FIR दर्ज कराना ही बड़ा काम हो जाए, वहां क्या होगा... कुछ दिन बाद मामला ठन्डे बस्ते में पड़ा पड़ा खुद ही कहता है 'मैं ही मर जाता हूँ'. फरियादी और अपराधी के मध्य सेवा शुल्क ले दे कर समझौता करा दिया जाता है और कहानी ख़त्म. 
जिस प्रकार से एक महिला एसपी का वीडियो वायरल हुआ है, इतनी असंवेदनशीलता कैसे बर्दाश्त की जा रही है, समझ से परे है. बहुत जल्दी हम सब कुछ भुला देंगे. और ये अंतहीन सिलसिला चलता रहेगा. फिर कोई नई निर्भया के इन्जार में. हम आज शर्मिन्दा हैं, आगे भी होते रहेंगे. 
@ संजय 'हिन्ना'  
Share on Google Plus

News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

0 comments:

Post a Comment

abc abc