शौचालय के पैसे से देवालय


एक गाँव में गाँव के लोगों की अलिखित सहमति और प्रयास से शौचालय की योजना पर खर्च होने वाले रुपयों के कुछ भाग को देवालय बनवाने में खर्च किया गया। और इस तरीके से वह गाँव ज्यादा पवित्र हो गया। भले ही गाँव जाने वाले रास्ते से गुजरने पर गंदगी और दुर्गन्ध से मन भिनकता रहे। रोग फैलता रहे। भजन कीर्तन की जगह तो बन गयी।
- ललित शंकर 
मैं शाम को अँधेरा घिरने से पहले अपने गाँव पहुँच जाना चाहता हूँ . जबकि अब हमारे जिले में वो भय आतंक का भाव नहीं है कि अँधेरा घिरने के बाद डरने वाली कोई बात हो. सबकुछ पहले से बदल गया है। अब देर रात तक आ जा सकते हैं।
पर देर शाम को गाँव जाने वाली सडक के दोनों ओर शौच पर बैठी महिलाओं को बहुत दिक्कत होती है जब कोई बीच से गुजरता है. खास कर बरसात में जब खेतों में पानी भरा होता है, उनके पास सड़क पर खुले में बैठने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। हर गुजरने वाला आँखे नीची किये हुए गुजरता है, और महिलाओं को बार बार उठना पड़ता है. शर्मिंदगी जो रोज झेलनी पड़ती है। और इस दृश्य, परिदृश्य कोई बदलाब नहीं आया है। कमोबेश देश के अधिकांश गांवों की यही स्थिति है। जबकि निर्मल ग्राम और शौचालय बनवाने के नाम पर कितने अरबों रूपये खर्च हो चुके, हजारों पुरस्कार निर्मल गांवों को दिए गए।
मेरी जानकारी के अनुसार मेरे जिले के ही एक गाँव में गाँव के लोगों की अलिखित सहमति और प्रयास से शौचालय की योजना पर खर्च होने वाले रुपयों के कुछ भाग को देवालय बनवाने में खर्च किया गया। और इस तरीके से वह गाँव ज्यादा पवित्र हो गया। भले ही गाँव जाने वाले रास्ते से गुजरने पर गंदगी और दुर्गन्ध से मन भिनकता रहे। रोग फैलता रहे। भजन कीर्तन की जगह तो बन गयी।
मेरे खुद के एक अनुमान के अनुसार मेरे गाँव के लगभग हर घर में शौचालय बनने में कम से कम बीस साल तो लगेंगे। फिर भी अमीरी से ज्यादा गरीबी तेजी से फैलती है, इस कारण सरकार के प्रयास के बिना नहीं होगा।
सरकार और लोगों दोनों के कानों पर जूं रेंगती या शर्म आती तो ये स्थिति कब की बदल चुकी होती। मुझे तो शर्म आती है। आप तो शहरी ठहरे, आप क्या समझेंगे।
( चित्र निर्मल ग्राम योजना के अंतर्गत बने शौचालय का है। नेट से डाउनलोड किया है। मेरे गाँव या अगल बगल के गाँवो में इन शौचालयों में गोईठा cow dung cake भरा रहता है।)
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News Digital India 18

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