क्या ये धर्म है या केवल कर्मकांड




मुढ़न धार्मिक संस्कार
या पाखंड केवल 
पैसा कमाने के चोंचले! 
सभी धर्म फिर क्यों नहीं मानते? 
व्यवहारिक तो यह है कि
बार बार बाल हटाने से
नये व मजबूत बाल आते!
फिर रीति रिवाज से
विधी विधान से उपनयन क्यों?
जो ना पहने जनऊँ वो शुद्र क्यों?
क्या भगवान ने इन्सान को जाँत जाँत में
घर्म धर्म में बाँट कर भेजा था !

फिर भी धर्मों के बंधन से
लोग कर्मबंध जाते
कोई जीवन भर बाल नहीं काटता
दाढी मूँछ को बढ़वाता
मन ही मन अपनी इच्छायें को मरता! 

कोई यौवन में गुरू का नाम लेता
कोई मौलवी बन जाता
तो कोई ज्ञान का पाठ पढ़ाने
मंक बन जाता !

अभी संसारिक जीवन जिया नहीं 
दुख: कष्ट ना आया उसके पाले में
बैरागी हो साधना में चला गया !
तो कोई स्त्री को दैवी बना
खुद उसका भोग किया
ये कैसा है तुम्हारा घर्म?
जहाँ ना खुद जीव मन का जिया 
ना अपने मन का किया !
जब ऊपर व्यक्ति के साथ 
उसके कर्म जाते तो
फिर आडंबरों का लागलपेट क्यों
जीने दो उसको आडंबर मुक्त !

@ कुमारी अर्चना


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