ऐसा भी होता है जनसुनवाई में, वाकया जो आपकी सोच बदल देगा


जनसुनवाई एक ऐसा माध्यम बन गया है कि हर आम व्यक्ति कलेक्टर से अपनी समस्या सीधे बता के संभावित निराकरण की अपेक्षा करता है, लेकिन जनसुनवाई में क्या होता है, यह सब जानते हैं, महीनों चक्कर लगाते रहो, तब भी कुछ नहीं होता। यही कारण है कि जनता का विश्वास उठता जा रहा है, जनसुनवाई में जो पहले पब्लिक रूचि लेती थी, वह कम हुई है। लेकिन कई बार कुछ के जीवन का वरदान भी बन जाती है जनसुनवाई। ऐसा ही एक वाकया संयुक्त कलेक्टर-रतलाम श्रीमती#लक्ष्मी गामड़ ने बयां किया है, जिसे पढ़ कर आप कह उठेंगे, जनसुनवाई में ऐसा भी होता है क्या?

उफ़्फ़ ये घड़ी की सुइयां अपनी निर्धारित गति से आज कुछ ज्यादा ही तेज चल रही हैं। मेहमान आये हुए हैं, पूरा भोजन भी अब तक तैयार नहीं हुआ है और 10 बज गए। हृदय तेजी से धड़कने लगा कि बस अब थोड़ी ही देर में कलेक्टर मैडम का कॉल आएगा कि 'लक्ष्मी हो गई शुरू जनसुनवाई...????' और मुझे उनसे पहले पहुँच कर#जनसुनवाई शुरू करना है। बस कुछ हाथ का काम और बाकी रहा था, तभी अपर कलेक्टर सर का फोन आया -'लक्ष्मी तुम जनसुनवाई शुरू करो, आज मेरी तबीयत खराब है, मैं नहीं आ पा रहा हूं।' 

ओह! तो मुझे बस अभी निकलना ही पड़ेगा। मैं भागते हुए बगैर कुछ खाये राजू से गाड़ी लगाने का कहती हूँ और तेजी से मीटिंग हॉल में जाकर आवेदकों की समस्या सुनना प्रारम्भ कर देती हूँ। ये मेरा प्रति मंगलवार का रूटीन है कि मुझे कलेक्टर सर और अपर कलेक्टर सर के साथ जनसुनवाई में आवेदकों की शिकायत का निराकरण करना है।
जनसुनवाई एक ऐसा माध्यम बन गया है कि हर आम व्यक्ति कलेक्टर से अपनी समस्या सीधे बता के संभावित निराकरण की अपेक्षा करता है। कल भी आम दिनों की तरह ही आवेदक विभिन्न प्रकार की समस्या लेकर आये थे और सभी को सुना जा रहा था, पर तभी कलेक्टर मैडम ने एक आवेदन मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा -'लक्ष्मी देखो इस लड़के की फीस का मामला है, इसलिए वाणिज्य कॉलेज की प्रिंसीपल से बात कर लो, और एक काम करो, इसे TL में ले लो और पता करो इसमें क्या कर सकते हैं।' मामला था एक लड़के की कॉलेज फीस भरने में असमर्थता का। मैंने उस लड़के को बैठने के लिए कहा कि मुझसे जनसुनवाई खत्म हो जाने के बाद मिले।
जैसे ही जनसुनवाई खत्म हुई, मैने वाणिज्य कॉलेज की प्रिंसीपल से बात की और पूछा हम क्या मदद कर सकते हैं, इस बच्चे की? मेडम ने कहा -'नियमानुसार तो इसे फीस भरनी पड़ेगी। चूंकि शासन के नियम हैं, तो उन्हें तोड़ा नहीं जा सकता।' मैने उस लड़के को अपने मोबाईल नम्बर दिए और कहा -'तुम कल मुझे कॉल कर लेना देखते हैं, तुम्हारे लिए क्या कर सकते हैं।' इसके बाद मैने अपने सोर्सेज से उस लड़के के बारे में पता किया कि कहीं वो फेक तो नहीं है?
जो जानकारी मिली उसके अनुसार नाम#अर्पित परिहार s/o स्वर्गीय श्री मोहनलाल परिहार निवासी प्रीतम नगर रतलाम। वाणिज्य कॉलेज रतलाम में द्वितीय वर्ष में अध्ययनरत। माता-पिता दोनों का स्वर्गवास हो गया और एक बहन वो भी दिव्यांग। है भगवान तू भी ना कमाल करता है, जब भी कोई ऐसा बन्दा होता है, उसके लिए मुझे ही क्यों चुनता है? बस सब जानकर मन विचलित हो गया क्या करूँ, कुछ समझ नहीं आ रहा था, फिर आंखें बंद करके सोचा तो लगा कि भगवान ने इसके लिए मुझे ही चुना है, इसलिए ये लड़का आज यहाँ तक आ पंहुचा है। और मैं तय कर चुकी थी कि मुझे क्या करना है। 
मैने अर्पित का आवेदन निकाला, उसपे उसके मोबाइल नम्बर लिखे थे, कॉल किया -'बेटा तुम कॉलेज पहुँचो, मैं तुम्हारी फीस भर रही हूं।' शायद ईश्वर भी यही चाहते हैं। मैं अपने बाबू श्री नरेन्द्र चौहान के साथ कॉलेज गई और मेडम से मिली तो वहाँ की प्रिंसीपल भी बहुत ही सरल और सहज लगीं और उन्होंने 1000 रुपये उस बच्चे के लिए दिए, और मैने 6500/- रुपये, इस तरह हम दोनों ने मिलकर 7500/- रुपये की फीस भर दी। आश्चर्य की बात ये रही कि उन मेडम का नाम भी श्रीमती लक्ष्मी दत्ता है
हम ख्वाबों की दुनिया में तो रोज ही जीते हैं, पर कभी इससे बाहर आकर एक के भी आंसू पौंछ लिए तो जीवन सफल, यह कहना है संयुक्त कलेक्टर-रतलाम श्रीमती#लक्ष्मी गामड़ का



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