दलित पुजारी : जातिवाद की दीवारें होने लगी हैं धराशायी




केरल से एक अच्छी खबर आयी है। केरल के पहले दलित पुजारी के तौर पर मुख्य मंदिर में पूजा शुरू कर येदु कृष्णन ने इतिहास में नाम दर्ज करवा लिया। उन्होंने थिरुवल्ला स्थित मणप्पुरम भगवान शिव मंदिर में काम शुरू किया। 22 साल के येदु ने शास्त्र में 10 साल तक प्रशिक्षण लिया है।
हाल ही में त्रावणकोर देवस्थानम भर्ती बोर्ड (टीडीआरबी) ने 36 गैर-ब्राह्मणों को पुजारी के पद पर चुना है। इन 36 लोगों में छह दलित समुदाय से आते हैं। केरल के धार्मिक स्थलों पर जातिगत पूर्वाग्रह-दुराग्रह का लंबा इतिहास रहा है। इसके खिलाफ यहां संघर्ष भी चला है। हालांकि राज्य में गैर-ब्राह्मण भी पुजारी बनते रहे हैं। लेकिन इनमें से ज्यादातर को छोटे-मोटे मठ-मंदिरों या निजी धार्मिक स्थलों में पूजा-पाठ की जिम्मेदारी ही मिलती है। टीडीआरबी पुजारियों की भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित करता है। इसमें सभी जाति के लोग हिस्सा ले सकते हैं।
इस पर आर्य समाज के डॉ विवेक आर्य का कहना है कि वस्तुत यह स्वामी दयानन्द के सिद्धांतों की विजय है। आधुनिक भारत में स्वामी दयानन्द ऐसे पहले समाज सुधारक हैं, जिन्होंने जातिगत भेदभाव को दूर कर सबसे पहले किसी भी शूद्र वर्ण व्यक्ति को वेद पढ़ने, यज्ञ करने, पुरोहित से लेकर विद्वान् बनने, शिक्षा के उपरांत यज्ञोपवीत धारण करने, ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वर्ण ग्रहण करने का अधिकार दिया था। स्वामी दयानन्द के आवहान के पश्चात आज आर्यसमाज में बिना जातिगत भेदभाव के कोई भी व्यक्ति शिक्षा प्राप्ति के पश्चात वेदों के विद्वान् से लेकर पुरोहित कार्य कर सकता है।
उन्होंने बताया दक्षिण भारत में जातिगत भेदभाव बड़े पैमाने पर है। ऐसे में यह सराहनीय कदम है। आशा है जातिवाद की दीवारें ऐसे ही धराशायी होती रहेंगी।
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