...तो फिर क्यों नहीं सुधारा जा सकता सिस्टम?



मैं पटवारी हूँ, पर इसकी कोई सहायता नहीं कर सकता.

बस इसकी गालियां सुन लेता हूँ और फिर हँस के

अपना काला चश्मा इसे लगा कर प्यारे "पूरा "को गले लगा लेता हूँ.

इस उम्मीद में कि कभी तो इसे इन्साफ मिलेगा.

"सारा सिस्टम ही खराब है", का रोना तो सब रोते रहते हैं, लेकिन इस सिस्टम में क्या दुसरे गृह के लोग हैं, अरे! इसमें भी हम सब ही तो हैं. तो फिर क्यों नहीं सुधारा जा सकता सिस्टम? एक कंकड़ तो अपने हिस्से का उछालो यारो. बदनामी के बीच एक पटवारी ऐसा भी है, जो सोचता है पूरा के बारे में. करना चाहता है पूरा के लिए कुछ, पर क्या करे? कैसे करे? कोई बात नहीं, अपने हिस्से की जिम्मेदारी तो उठा रहा है. सैल्यूट मित्र ललित. #मुकुट सक्सेना


ये कहानी आज से 55 -60 वर्ष पूर्व तब शुरू हुई, जब एक महिला अपने पति की मृत्यु के 2 साल बाद गर्भवती होकर माँ बनी. आश्चर्य की बात तो थी किन्तु इसके पीछे रसूखदार लोगों की हवस और एक अबला का परिवार के लालन पालन हेतु समर्पण था. पूरा, पूरण, पुरया कई नाम से बुलाये जाने वाले इस शख्स को देख कर आपको लगेगा कि ये गले में ढोल टाँग कर घूमने वाला वृद्ध कोई पागल होगा, लेकिन हालात के मारे या यूँ कहे भू प्रबन्धन (बन्दोबस्त) के मारे हुए इस व्यक्ति की जमीन तत्कालीन गिरदावर ने उलट फेर कर किसी और के नाम कर दी.


पूरण लगभग 40 साल से इसी जमीन को हांक जोत कर बोता आया है. पत्थर से पटी हुई जमीन से भाटे बिन बिन कर कृषि योग्य बनाई गई जमीन को एक दिन आर आई और पटवारी ने किसी आवेदक के कहने पर नाप दिया. पता चला कि वर्ष 1997-98 में जमीन का नक्शा बन्दोबस्त में बदल कर पूरण की बजाय गाँव के पूर्व सरपंच के नाम कर दी है. ये वही सरपंच है, जिन्होंने अपने कार्यकाल में ऐसे तमाम लोगों को शासन की योजना के अनुरूप तत्कालीन पटवारी के साथ मिल कर जमीन के पट्टे दिए थे.


आज नपती के बाद पूरन की 5 बीघा जमीन सरपंच ने हड़प ली. हर बार एक नए आवेदन के साथ पूरा तहसील आता है. गिरदावर, पटवारी और सरपंच को गालियां देता है. सिस्टम इतना खराब है कि बन्दोबस्त करने वाला कर के मर गया और पीछे छोड़ गया कई अनसुलझी कहानी, जिसे ठीक करना पटवारी के हाथ में नहीं. बस हर बार पूरण आवेदन ले कर आता है और में उसे गले लगा कर कुछ रुपये दे देता हूँ. इस उम्मीद के साथ कि कभी तो इसके साथ ये सिस्टम न्याय करेगा.

जिस ऊसर पहाड़ी जमीन को 40 साल में इसने खेती लायक बनाया, उसे एक बन्दोबस्त में फिर पत्थर पहाड़ नाले में धकेल दिया. ऐसा इसलिए हुआ कि इस अभागे की कोई संतान नहीं, कोई परिवार नहीं, न इसके पास, तब कुछ ऐसा था, जो ये बन्दोबस्तकर्ता को दे देता और इसकी जमीन बच जाती.

मैं पटवारी हूँ, पर इसकी कोई सहायता नहीं कर सकता. बस इसकी गालियां सुन लेता हूँ और फिर हँस के अपना काला चश्मा इसे लगा कर प्यारे पूरा को गले लगा लेता हूँ. इस उम्मीद में कि कभी तो इसे इन्साफ मिलेगा.
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