अशोक मिज़ाज : ये वह लिबास है, जो कभी भीगता नहीं

आज की ग़ज़ल के सशक्त हस्ताक्षर अशोक मिजाज 


डॉ. बशीर 'बद्र' ने अशोक मिजाज के बारे में अंतर्मन से यह बात तहरीर की है कि अशोक मिजाज न केवल उनके शागिर्द हैं, बल्कि नए दौर के काबिले कद्र और काबिले जिक्र शायर हैं. उर्दू को उनकी ग़ज़ल पर रश्क आता है. यही कारण है कि वह आम आदमी के हरदिल अजीज और चहेते शायर बन गए हैं. वह उर्दू और हिन्दी के बड़े सेतू होकर हिन्दुस्तानी जबान के शायर हैं और हमारी गंगा जमुनी तहजीब के इल्मकिरदार हैं, इसीलिये तो उन्होंने लिखा है- "चाहत पहन के बंदिशों में घूमता हूँ मैं, ये वह लिबास है जो कभी भीगता नहीं "

आज के दौर का बेबाक सखुनवर अशोक मिजाज आज की गजल का
@ अहद 'प्रकाश', भोपाल
सशक्त गजलकार बनकर साहित्य के क्षितिज पर जिस तेजी से चमकता दमकता दिखाई दे रहा है, उस पर कतई आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि पहले ही डॉ. बशीर ‘बद्र’ लिख चुके हैं. 
'हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के अदबी रिसालों में हज़ारों शायर छप रहे हैं, लेकिन ग़ज़ल इतनी आसान नहीं है, जितनी की नज़र आती है. यही वजह है कि  हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में चंद शायर ऐसे हैं, जो ग़ज़ल के बदलते हुए मिज़ाज का साथ देने में कामयाब हैं. पिछले दस सालों में जो शायर उभरे हैं, उनमें 'अशोक मिज़ाज' सरे फ़हरिस्त हैं.'
"जुल्म के सामने तलवार हूँ खंजर हूँ मैं 
आज के दौर का बेबाक सखुनवर हूँ मैं "
यह बात लिखते हुए मैं आश्वश्त हूँ कि डॉ. बशीर 'बद्र' ने अशोक मिजाज के बारे में अंतर्मन से यह बात तहरीर की है कि अशोक मिजाज न केवल उनके शागिर्द हैं, बल्कि नए दौर के काबिले कद्र और काबिले जिक्र शायर हैं. उर्दू को उनकी ग़ज़ल पर रश्क आता है. यही कारण है कि वह आम आदमी के हरदिल अजीज और चहेते शायर बन गए हैं. वह उर्दू और हिन्दी के बड़े सेतू होकर हिन्दुस्तानी जबान के शायर हैं और हमारी गंगा जमुनी तहजीब के इल्मकिरदार हैं, इसीलिये तो उन्होंने लिखा है- 
"चाहत पहन के बंदिशों में घूमता हूँ मैं, 
ये वह लिबास है जो कभी भीगता नहीं "
उनके बारे में - राहत इंदौरी कहते हैं 'अशोक मिज़ाज' इस ख़राबे में इंसानियत और मुहब्बत का पैग़ाम लेकर आये हैं. भाईचारे और यकजहती को अपनी शायरी के ज़रिये आम करना चाहते हैं. इंसानी हमदर्दी और इंसानी बराबरी इनका ख्वाब है. अशोक अपनी फिक्र की सदकतों के सबब मौजूद हालत में न सिर्फ कौमी बल्कि आलमी सतह पर ये साबित करने में कामयाब हैं कि यही आवाज़ आलमी भाईचारे को ज़िंदा रखने को जरूरी है.
"सरे आम तुझपे बरस पड़ें, ये महकते फूलों की वादियाँ 
मैं मुरब्बतों का दरख़्त हूँ, तू बढ़ा के हाथ हिला मुझे.."


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