आनन्द के लिए नियम तोड़ते हैं, लेकिन नियम बने रहते हैं और हम टूट जाते हैं



- डॉक्टर अरविन्द जैन शाकाहार परिषद् भोपाल
जिस किसी की मानसिकता उनके मांस खाने की है, उसमें उन्हें रश्क आता है. आनंद आता है उसमे उन्हें कोई हिंसा का भाव नहीं होता है. असल में हमेशा हमें यही सिखाया जाता है कि हमें झूठ नहीं बोलना चाहिए, हमें यह नहीं सिखाया जाता कि हमें सच बोलना चाहिए. जहाँ लिखा होगा पेशाब करना मना है, तो वहां जरूर पेशाब करेंगे ही.
हमारा देश प्रजातांत्रिक धर्म-निरपेक्ष देश है और देश के बारे में क्या क्या नहीं कहा जाता है. यहाँ सबको स्वत्रंता के साथ स्वच्छंदता है. सबको अपने मन मर्ज़ी से काम करने का अवसर होता है. यहाँ भाषण बहुत होते हैं. हमारे संस्कार विवाद युक्त होते हैं, यहाँ कोई भी काम सुमति से नहीं होता. कारण भिन्न भाषा, जाति, खान-पान, विचार धारा और किसी किसी का लक्ष्य विरोध. और नेतागिरी के अलावा कोर्ट का सहारा, जनता का सहारा, भीड़तंत्र का सहारा और षडयंत का सहारा. सहारा प्रधान देश है, इसीलिए सहारा जेल में है. विवाद असीमित हैं और हल असंभव है. हल की सोच ख़तम हो गयी. विवाद पैदा करो, जिससे मुख्य समस्या से जनता भटक जाए और विवाद रह जाये. हाल में प्रधान मंत्री जी ने भावावेश में कहा कि गाय की रक्षा के नाम पर इंसान को मारना कतई बर्दाश्त नहीं. और इंसान को मारना क्या गौ भक्ति है? क्या ये गौ रक्षा है? और उसके बाद झारखण्ड में एक की हत्या हो गयी. विवाद और हल हमारी मानसिकता पर निर्भर है. और कुछ विवाद हमारे स्वयं के द्वारा निर्मित किये जाते हैं. और हल हमारे देश में नियम कानून की अपेक्षा हिलमिल कर, मिल-बैठकर और एक दूसरों के भावों को समझकर और नैतिकता के आधार पर निकाले जा सकते हैं. लेकिन यहाँ चार दिशाओं की राजनैतिक पार्टी है और सब एक दूसरे से 36 हैं. जिस प्रकार हम कुछ भी बोले तो पाकिस्तान को विरोध में बोलना ही है. उसका कारण हमारा चिंतन बिलकुल भिन्न है, जैसे हम सूर्य की पूजा करते, वे चन्द्रमा की. हम शाकाहार पर ज़ोर देते हैं, तो वे मांसाहार पर. यह भी सही है कि इतनी बड़ी आबादी वाला देश है तो विवाद होना स्वाभाविक है, आप सबको खुश नहीं कर सकते. यहाँ विवाद वैचारिक के साथ जातिगत, राजनैतिक, भावनात्मक होते हैं या बनाये जाते हैं, यह गलत है. हमने एक जाति विशेष को पूर्णतया मांसाहारी मान लिया और बहुल जाति के लोग अपने आपको शाकाहारी मानते हैं, पर ऐसा नहीं हैं . जैसा अभी अभी राजनेताओं ने कहा की खान पान में कोई दवाब नहीं होगा. कुछ राज्य अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण मांसाहार करने को बाध्य हैं. मेरा कहना है कि खूब खाओ और उधार लेकर खाओ. आज ये सब आहार जातिगत न होकर आर्थिक हो गए हैं. गरीब आदमी मंहगाई के कारण खा नहीं सकता और धनवान ही इसका उपभोग करता है, जिस किसी की मानसिकता उनके मांस खाने की है, उसमें उन्हें रश्क आता है. आनंद आता है उसमे उन्हें कोई हिंसा का भाव नहीं होता है. असल में हमेशा हमें यही सिखाया जाता है कि हमें झूठ नहीं बोलना चाहिए, हमें यह नहीं सिखाया जाता कि हमें सच बोलना चाहिए. जहाँ लिखा होगा पेशाब करना मना है, तो वहां जरूर पेशाब करेंगे ही. हमारा स्वाभाव बन गया है नियम तोडना. नियम के विपरीत चलना, लाल बत्ती में क्रास करना. जिस काम से रोका जाए, उसे जरूर करना. कारण कुछ अहंकार आड़े आता है और कुछ जिनका वर्षों से व्यापार या आजीविका है उस पर रोक लगाएंगे तो विरोध/विद्रोह करेंगे. देश में कानून लचीला है. कब कौन से तर्क कोर्ट मान्य कर ले या मान्य न करे और इसके पीछे फिर व्यापारी, नेतागिरी, असामाजिक तत्व अपना खेल शुरू कर देते हैं . जैसे भारत वर्ष में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए लगभग सौ वर्ष हो गए, पर नहीं बनी. सौ साल से अधिक हो गए, जो हिन्दू मुस्लिम में जो दरार या तो अंग्रेजों ने डाली या खुद नेताओं ने डाली में एकता होना नामुमकिन और असंभव हैं. इसी प्रकार गौहत्या करके गौमांस खाना और निर्यात करना, तस्करी का खेल वर्षों से चल रहा है. इसमें सरकार का भी योगदान रहा है. कारण मांस निर्यात में भारत अग्रिम है. इससे सरकार को आमदनी होती है. अब जब पशुधन के अभाव में होने वाला भविष्य अंधकारमय लगने के कारण यह कदम उठाये जा रहे हैं. इस विषय पर नियम, कानून के साथ बहुत मुकदमे न्यायालय में चले और कई सरकार हारी या जीती, पर उसका प्रतिफल शुन्य रहा. खाने वाले और चिढ़ाने के लिए खाएंगे और नियम तोड़ेंगे और नए नए हत्कंडे अपनाएंगे. इसका एक ही हल है कि नियमानुसार मांस की बिक्री हो और खूब खाने को प्रोत्साहित करें, और कहा जाए कि मांस खाओ और असाध्य बीमारियां बुलाओ, हमें क्या. इसके खाने से कैंसर, तनाव, मानसिक रोग और हिंसक भाव पैदा होते हैं और एक समय स्वयं अपचन होने से दाल रोटी पर आते हैं. इसीलिए हम विरोध न करें. यह रोग समस्या नैतिकता से ही दूर कर सकते हैं, नियम, कानून, अध्यादेश प्रभावहीन /असरहीन हैं और रहेंगे, जब तक पालक, शासक, अफसर, नेता, राजनीतिक हस्तक्षेप करने वालों में इसके प्रति निष्ठा न हो. इसमें जीवदया, अहिंसा और शाकाहार के कारण बहुत हद तक समाज, देश, व्यक्ति में आने से सुख शांति का प्रादुर्भाव हो सकेगा, पैसे के लिए आदमी एक दूसरे के खून का प्यासा है. अब तो जातिगत विष ने हमें इतना संकीर्ण बनाया कि हम अब एक दूसरे के भावों तक को आदर नहीं देते. हमें अब अहिंसा, अनेकांतवाद का उपयोग करना होगा, भाषण से कुछ नहीं होता मन वचन और कर्म में एकाकार होना चाहिए. और मानव, जीव हिंसा पर रोक लगना चाहिए. नियम सब बने हैं कि हम बने रह सकें, लेकिन होता यह है कि नियम बने रहते हैं और हम टूट जाते हैं.

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