कंगना के बेबाक बयान और सिमरन


समीक्षा : इदरीस खत्री
अमेरिका के जॉर्जिया में एक 30 वर्षीय तलाक शुदा, मध्यम वर्गीय लड़की प्रफुल्ल पटेल(कंगना) , जो कि उन्मुक्त विचारों के साथ नौकरानी के काम में लगी है.  खुले विचार जैसे सेक्स, शराब, जुए को लेकर और पाश्चात्य संस्कृति दोनो मेल खाती भी है. तो प्रफुल्ल को बिंदास होना नयापन नहीं लगा.
लॉस वेगास में जुए की लत के चलते एक गलत कदम जेल तक के दर्शन और मुसीबतों की शुरुआत होती है और चोरी करने लगती है, यहां तक कि बैंक रॉबरी तक पहुच जाती है. एक अच्छे साथी की तलाश उसे बहकने में मदद करती है. क्या प्रफुल्ल ज़िन्दगी की गाड़ी पटरी पर ला पाती है? तो फ़िल्म देखना पड़ेगी.
फ़िल्म की कहानी मध्यांतर तक तो जमने में लगी रहती है. अमेरिका जैसे तकनीकी सम्पन्न देश मे बैंक रॉबरी हजम नहीं होती. किरदार, बोल्डनेस ओर दूसरे हाफ में कुछ पटरी पर आते आते देर हो चुकी होती है. 
हंसल ने शाहिद, सिटी लाइट्स बनाई है तो उम्मीदे बढ़ना लाजमी था, लेकिन मामला जमा नहीं. सामने फरहान की लखनऊ सेंट्रल ओर ऋषि, परेश रावल की कॉमेडी फिल्म पटेल की पंजाबी शादी फ़िल्म होना भी नुकसान देह होगा.
कंगना का रितिक और लेखक अपूर्व असरानी(लेखक सिमरन) विवाद, आपकी अदालत में कंगना के बेबाक बयान नुकसान साथ लाए हैं. सिंगल स्क्रीन में बहुत सारी पटकथा अंग्रेजी में होना भी नुकसान देह होगा. संगीत सचिन जिगर का अच्छा है, 7 गांनो में मीत , सिंगल रहने दे, लगती है थाई, पिंजरा तोड़ के, ओर बरस जा अच्छे बन पड़े है. 
कंगना के अभिनय की चमक फिर देखने को मिलेगी. वह बहुत सारे शेड्स में अभिनय करती दिखी, जो कि लाजवाब है. अनुज धवन की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. अनुज ने लोकेशन भी सुहावनी बना दी है.


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