शिक्षा की गिरावट का मूल कारण हमारा अन्धानुकरण?


-डॉक्टर अरविन्द जैन भोपाल 

उन्हें जिले, संभाग, प्रान्त और राष्ट्र की जानकारी दे, इतिहास, नागरिकता और नैतिक चारित्रिक ज्ञान मिले उन्हें महापुरुषों ,धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था क्या होती हैं नहीं मालूम. परिवार की संरचना में उनकी क्या उपयोगिता हैं. आज बच्चो को जिले की दिशाओं का बोध नहीं हैं, गांव में कोटवार, पटवारी, तहसीलदार ,कलेक्टर, कमिशनर का क्या पद होता है और उनकी क्या उपयोगिता है, सामाजिक व्यवस्था क्या होती है, उन्हें देशी महीना का ज्ञान नहीं, कौन ऋतु कब आती है और कौन कौन त्यौहार होते हैं, उनका क्या इतिहास हैं, ये आज के बालकों को नहीं मालूम.
शिक्षक से शिक्षक के अनुरूप काम कराएं. जैसे शौचालय की खुदाई कराये और उसकी रिपोर्ट भेजे, मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था करे. यह गलत है. इस विषय पर खुली बहस की जरुरत हैं.
जिस प्रकार हमारा संविधान चार स्तम्भों पर टिका हैं उसी प्रकार हमारी शिक्षा भी चार स्तम्भों पर टिकी है. पहला शिक्षक, दूसरा छात्र तीसरा पाठ्यक्रम और चौथा बुनियादी आवश्यकता .इनमे से जितना जितना स्तम्भ कमजोर होगा शिक्षा में उतनी अधिक गिरावट आती हैं और उसका स्तर गिरा हुआ माना जाता हैं. आज भी हम शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पीछे हैं अभी एक संस्था ने ३५ देशों के १५ से २४ साल के छात्रों पर जो अध्ययन किया उसमे हम मात्र २९ वे नंबर पर शैक्षणिक वातावरण में हम ३० वे नंबर पर हैं ! यह हमारे लिए बहुत चिंतनीय है.

हम अब भी लाड मेकाले को कोसते हैं और उसी की लकीर पर लाठी पीट रहे हैं ! आज सत्तर वर्ष के बाद भी हम उसके कारनामों के ऊपर रो रहे हैं यह उचित नहीं है. हमारे देश में शिक्षा के सुधार के कई कार्यक्रम हुए और होते रहते हैं, पर पता नहीं हम विदेशों की शिक्षा को माप दंड मानकर सुधार की अपेक्षा कर रहे हैं. यदयपि हमारा देश विशाल हैं और यहाँ प्रांतीयता वाद और स्थानीय वाद का बहुत अधिक चलन हैं और इसके आलावा हमारी शिक्षा एक प्रयोगशाला बन गयी हैं हर नेता, पार्टी अपने प्रयोग करती हैं, उस विचार धारा को समझने में बहुत समय लगता हैं और फिर पता चला की उस पार्टी का परिवर्तन हुआ या उस पार्टी के नेता का विभाग बदल दिया.और पूरी मेहनत अकारथ हो जाती .
नए नए प्रयोग करने से जो शिक्षक पहले के पढ़े हैं उनमे ग्रहण शीलता न होने से वे फिर अरुचि से पढ़ाते हैं इसके लिए शिक्षक को समय समय पर प्रशिक्षण मिलना चाहिए .एक बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए की बार बार पाठ्यक्रम में बदलाव लाभप्रद की अपेक्षा हानिकारक होता हैं . पाठ्यक्रम बनाने वाले अंतर राष्ट्रीय स्तर की सोच रखकर पाठ्यक्रम लादते हैं ,जब शिक्षक को उन विषयों पर आधारभूत ज्ञान नहीं हैं तो वे छात्रों को क्या पढ़ाएंगे. प्राइमरी और मिडिल स्तर पर पढाई का स्तर ऐसा हो जो छात्रों को बुनियादी ज्ञान के साथ जीवनोपयोगी शिक्षा हो. उन्हें जिले, संभाग, प्रान्त और राष्ट्र की जानकारी दे, इतिहास, नागरिकता और नैतिक चारित्रिक ज्ञान मिले उन्हें महापुरुषों ,धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था क्या होती हैं नहीं मालूम. परिवार की संरचना में उनकी क्या उपयोगिता हैं. आज बच्चो को जिले की दिशाओं का बोध नहीं हैं, गांव में कोटवार, पटवारी, तहसीलदार ,कलेक्टर, कमिशनर का क्या पद होता है और उनकी क्या उपयोगिता है, सामाजिक व्यवस्था क्या होती है, उन्हें देशी महीना का ज्ञान नहीं, कौन ऋतु कब आती है और कौन कौन त्यौहार होते हैं, उनका क्या इतिहास हैं, ये आज के बालकों को नहीं मालूम. कौन रामायण महाभारत के पात्र थे, कितने धर्मगुरु, कितने नेता जिनने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया, जैसे बुनियादी शिक्षा दी जाये. आज कोर्स इतना कठिन होता जा रहा हैं की माता पिता को पसीना आता है और शिक्षक मात्र खाना पूर्ती कर देते हैं. भाषा स्थानीय हो और अंग्रेजी को दूसरी भाषा में रखा जाये पहली हमारी हिंदी हो जिससे बालकों में ग्रहण शीलता बनी रही. आज बालक न अंग्रेजी में पारंगत हैं और हिंदी से अनभिज्ञ हैं. इस पर बल देने की जरुरत हैं. शिक्षक से शिक्षक के अनुरूप काम कराये. जैसे शौचालय की खुदाई कराये और उसकी रिपोर भेजे, मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था करे. इस विषय पर खुली बहस की जरुरत हैं .
छात्र में इतना उत्साह हो की वह स्वयं स्कूल जाने का आग्रह करे .पर आजकल स्कूली शिक्षा का बोझ इतना अधिक होने के कारण, होम वर्क न कर पाने के कारण ,इतना अधिक कोर्स होने के कारण और विषय वस्तु नासमझने के कारण बालक स्कूल जाने में कन्नी काटते हैं और स्कूल का समय प्रारंभिक शिक्षा में सुबह से होता हैं .अधिकांश बालक नींद न पूरी होने के कारण भी स्कूल जाने में घबराते हैं या अरुचि होती हैं .कोर्स ऐसा हो जो उनके भविष्य निर्माण में सहायक हो . इस पर भी मनोवैज्ञानिक स्तर पर चर्चा करना होंगी और क्रियान्वयन करना होगा.
पाठ्यक्रम किसी भी सत्ता से प्रभावित न हो और उनमे समय समय पर उपयोगी सामग्री का समावेश हो जो जीवन में कारगर हो आज विषय ऐसे रखे जा रहे हैं जो आज से तीस चालीस साल पहले हायर सेकेंडरी स्तर पर पढ़ाये जाते थे पर हम बालक को उसके दिम्माग में ऐसा माल ठूंस रहे जिससे वह न समझ पाने के कारण कोचिंग करने को मजबूर होता हैं और वेभी पढ़ने में असमर्थ होते हैं और माँ बाप बच्चों से अधिक तनावग्रस्त होते हैं इसमें सुधार की जरुरत हैं और बारबार परिवर्तन न करे और हर साल किताबों में परिवर्तन न करे जिससे शिक्षक भी विषय से जुड़ सके और निष्ठां से पढ़ा सके .
स्कूल का बुनियादी ढांचा बदलना होगा ,आज स्कूल कुकरमुत्तों से जैसे खुल रहे हैं ,आज बहुत अधिक प्रतिष्ठित स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा का प्रश्न बहुत ज्वलंत समस्या हैं ,स्कूलों में प्रायोगिक सामग्री हो, शिक्षक योग्यता पूर्ण हो और वहां का वातावरण मनोकुल हो और उसके कारण बच्चे निर्भय होकर जाए और माता पिता निश्चिन्त रहे.
हम अपने बच्चों को पश्चिमोनमुखु बनाने की चेष्टा में व्यस्त हैं, पश्चिम की सभ्यता का विरोध नहीं पर अन्धाधुकरण करना उचित नहीं. वहां के वातावरण ने हमारे देश की मूल संस्कृति पर हमला कर नेस्तनाबूद कर दिया. उससे हम न पूर्व के रहे न पश्चिम के और हमारी शिक्षा ने अपना मूल रूप खो दिया. यह गिरावट हमें कितना निम्मतरस्तर तक ले जाएँगी कह नहीं सकते पर इस कारण भविष्य अंधकारमय जरूर हो रहा हैं.
माँ बाप ही पहले शिक्षक होते हैं बच्चे के.
परिजन परिवेश करता हैं प्रभावित उसको 
भाई बहिन परिजनों का साया उसे पनपाता हैं उसको 
शाला शिक्षक दोस्त यारों की संगत पल्लवित करती उसको 
इसी क्षण में जो बीजारोपण होता हैं उसमे वही उसकी नीव हैं 
गीली मिटटी को ठोककर बनालो अपने अनुसार 
उसके बाद उसके संस्कार उसे बनाते बलवान. 
आज जरुरत हैं हमको मानव की, क्यों बना रहे हम उसे मशीन ???
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News Digital India 18

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