प्रदेश में अराजकता का माहौल, कठिन डगर है 2018 की

मंदसौर किसान आन्दोलन, समय पर स्थिति नहीं समझ सकी सरकार


मौसम की बेरुखी : सोयाबीन में फली तो लगी पर नहीं बन रहा दाना


छोटे मोटे काम भी नहीं होने से किसान परेशान
बन रही है अराजकता की स्थिति

प्रदेश में अफसरशाही हावी है, चाहकर भी मंत्री अपने ज्यादा करीबियों के सही काम भी नहीं करा पा रहे. जो काम अधिकारी नहीं करना चाहते उनमें बड़ी कमी बताकर उन्हें गुमराह कर देते हैं. राजनेताओं की योग्यता में कमी के कारण भी वह डर जाते हैं. इससे आम कार्यकर्ता के सही काम भी नहीं हो पा रहे हैं. 
सूत्रों की मानें तो प्रदेश में प्रशासनिक एंटी इनकमबेंसी से इनकार नहीं किया जा सकता, बल्कि यह तय है कि प्रदेश में अफसर, कर्मचारी जगत सरकार के खिलाफ पूरा मन बना चुका है. और अब वह सरकार के खिलाफ जनता में अराजकता की स्थिति बना रहा है. सरकार के पास कोई ठोस विश्वसनीय और सही सलाहकार न होने से भी सरकार स्थिति भांपने में असफल है. 
तहसीलों में आज भी परेशान है किसान 
पिछले दिनों मुख्यमंत्री के निर्देश कि गलत लोगों को चयनित किया जाए मैं इन्हें हटा दूंगा, के बाद स्थिति और ज्यादा खराब हुई है. गलत लोग सही लोगों को टारगेट  कर रहे हैं. इस सबमें सबसे ज्यादा किसान पिस रहा है. मौसम की बेरुखी से उसका सोयाबीन खराब हो रहा है. फली तो लगी पर दाना नहीं बन रहा. पानी कम गिरने से अगली फसल की संभावनाएं भी बिगड़ रही हैं. सो उसका चिंतित होना स्वाभाविक है, ऐसे में उसके छोटे मोटे काम भी नहीं होने से वह परेशान है. तहसीलों में चक्कर काटते पेशियाँ करते करते थक गया है वह. यहाँ कोई काम बिना लिए दिए आसानी से होता ही नहीं. हाल में सरकार सख्त हुई है, लेकिन फिर भी मामले पेंडिंग किये जा रहे हैं. कभी पटवारी नहीं सुनता तो कभी तहसीलदार नहीं सुनता. 
मुख्यमंत्री की सही से काम नहीं करने वालों को उलटा टांग देने की बात करने पर जिस प्रकार से तहसीलदारों ने कदा रुख अख्तियार किया कि एक ही दिन में सरकार को बैकफुट पर आना पडा बल्कि मुख्य सचिव के आंदोलित तहसीलदार संघ के प्रतिनिधिमंडल से यह कहने से कि नेताओं की बात दिल पर क्यों लेते हो सरकार की किरकिरी हुई है.
नहीं बन सका खेती फायदे का सौदा
सरकार कुछ कुछ मामले को समझ रही है, इससे निपटने के लिए वह प्रयास भी कर रही है. रातापानी में किस अफसर और मंत्री की आपस में पटरी नहीं बैठ रही है, और कैसे बैठाई जाए, केवल यह काफी नहीं है. देखना यह होगा कि दोनों में से गड़बड़ कौन कर रहा है. जब तक जमीनी स्तर के छोटे से छोटे कार्यकर्ता की नहीं सुनी जायेगी. हकीकत सामने नहीं आयेगी. मंदसौर किसान आन्दोलन के पीछे क्या था और कहाँ से अचानक आ गयी इतनी प्याज? कि बढ़ती ही गयी? ये वो सवाल हैं जिनका उत्तर नहीं खोजा जाएगा, समस्या क्या है, पता ही नहीं होगा, तो हल कहाँ से निकलेगा. समय तो अपनी गति से बढ़ ही रहा है.  
(वि सं)

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