स्त्री शक्ति के एकीकरण में सबसे बड़ी बाधा

स्त्री दृष्टि से -आम और खास


- रंजना जायसवाल, गोरखपुर 

पुरूष तो कभी किसी स्त्री को ‘खास’ मानता ही नहीं, जुबान से भले ही कह दे| स्त्री के मस्तिष्क होने को वह आज भी दिल से स्वीकार नहीं करता|उससे उम्मीद रखना खुद को धोखे में रखना है पर मेरी दृष्टि में स्त्री सशक्तिकरण के सबसे अधिक खिलाफ जाता है जागरूक और विशिष्ट यानी खास स्त्रियों का खुद को विशिष्ट यानी खास मानकर चलना| वे खुद को खास मानती हैं अपने सौंदर्य, प्रतिभा और उपलब्धियों के आगे दूसरी स्त्रियों के सौंदर्य ,प्रतिभा और उपलब्धियों को नगण्य समझती हैं या फिर किसी की कृपा से हासिल समझती हैं|
साहित्य जगत भी इससे अछूता नहीं| अपने लेखन के आगे औरों के लेखन को तुच्छ समझना ...उसे देखना तक नहीं पढ़ना तो बड़ी बात है |उभरती लेखिकाओं को डामिनेट करने के लिए नाना तिकड़म करना, अपने पावर का, परिचय का उपयोग करना खूब चल रहा है| यह सब खुद को खास रखने और अन्याओं को आम बना देने के लिए है जो स्त्री शक्ति के एकीकरण में सबसे बड़ी बाधा है|
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