कागज पर भरपेटिया रातें, बहुत हो गईं नेता जी

                                                  
 - प्रेम प्रदीप         
रोटी, कपड़े, छत की बातें बहुत हो गईं  नेता जी
भाषण में सारी सौंगातें, बहुत हो गईं नेता जी
लल्ली, लल्लन, घीसू, बुधिया, सत्तर साल से भूखे हैं
कागज पर भरपेटिया रातें, बहुत हो गईं नेता जी
मूलभूत सुविधायें दुर्लभ, बुलेट ट्रेन की डुग-डुग- डग
बिन पानी वाली बरसातें, बहुत हो गईं नेता जी
योजनाओं पर योजनायें हैं, घोटालों पर घोटालें
लोकतंत्र पर जुत्तम-लातें, बहुत हो 
गईं  नेता जी
पॉच वर्ष के जनमत में ही, सात जन्म का अर्जन कर
संविधान से इतनी घातें, बहुत हो
गईं नेता जी 
काबिल, नैतिक, मेहनतकश वंचित सारी सुविधाओं से
चापलूस, लंपट औलादें, बहुत हो 
गईं नेता जी . .
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