खुद पर यकीं हो तो अंधरे में भी मिल जातें हैं रास्ते


- रश्मि रानी, पटना 
फलक की जिद है जहां बिजलियाँ गिराने की
हमारी भी जिद है वहीं आशियाँ बनाने की !
यूँ तो किताबें कितनी ही बेहद दिल के करीब रहीं ...पर ये किताब "छोरा कोल्हाटी का" कुछ अलग असर कर गयी एक नजरिया दे गई। इसलिए आज चर्चा इस किताब की करना चाहती हूँ आप सब से।
"शिक्षा शेरनी के दूध की तरह है पियोगे तो गुर्राना तो आ ही जायेगा".पढो। संघर्ष करो और संगठित रहो।
जिसने बाबा साहेब अंबेदकर के इस वाक्य को अपना कर्मवाक्य बना लिया, आज बात उसी होनहार की..! " छोरा कोल्हाटी का".
मराठी के प्रसिद्ध लेखक समाज सुधारक डॉक्टर किशोर शांताबाई काले की मार्मिक जीवन गाथा है!
ये सिर्फ एक किताब नही..एक जद्दोजहद है..जुझारूपन है ....अदम्य इच्छा है पढ़ने की...जिजीविषा है जानने की..गिर कर भी उठ खड़े होने की।
महाराष्ट्र का कोल्हाटी समाज जिसकी स्त्रियां नाच गाने के पेशे से जुड़ी होने के कारण शादी नही कर सकतीं। जिनके पति बदलते रहते हैं..पतियों के लिए जिनकी सार्वजनिक नीलामी होती है... जिनके बच्चे पढ़ लिख नही सकते...!
समाज की अविश्वसनीय विसंगतियों पर तेज रोशनी डालनेवाली अद्भुत सत्यकथा है "छोरा कोल्हाटी का"
लेखक के शब्दों में--- कोल्हाटी समुदाय की हर महिला का चीरहरण आज भरे बाजार में हजारों लोगों के सामने किया जाता है। कोल्हाटी समाज मे बेटी के जन्म होने पर खुशियां मनाई जाती। छह सात साल की उम्र में लावणी नृत्य सिखाया जाता है..किसी भी खूबसूरत कोल्हाटी महिला की शादी नही की जाती, जो आदमी लगातार ऊंची बोली लगाता वही चीरा की रस्म का हकदार बनता। यह रस्म कुछ और नही शारीरिक सम्बन्ध का राजीनामा है।
किशोर शांताबाई काले भी चीरा की रस्म से ही पैदा हुआ था।उसके पिता कॉंग्रेस के विधायक थे। जन्म के बाद छोड़कर चले गए थे फिर कभी वापिस नही आये.. जो अक्सर कोल्हाटी महिलाओं के साथ होता ।
ये कहानी है समाज के उस तबके की जहां औरतें तिल -तिल मरती हैं।अजीब सा समाज ,अजीब से रस्मों-रिवाज ।बेटी को बेचता बाप ।जहां प्यार करना गुनाह पर जिस्म का सौदा करना बड़ भाग....! खुद पर कोई हक नही, सिर्फ नाचना पैसे कमाना अपने माँ- बाप ,भाई को जिंदा रखना ही मकसद ...! भले उसके बच्चे बिलख रहे, उनके लिए दूध पिलाने की भी फुरसत ना रहे. भले निठल्ले बाप भाई परिवार मुर्ग-मुसल्लम उड़ाएं और इनके बच्चे दूध को भी तरस जाएं..! यहां लड़कियों को सपने देखने की इजाजत नही .. क्योकि डर है टूटेंगे ही बिखरंगे ही ..किरचें जिस्म में चुभेगी ही...!!
आंखों में दर्द इतना की समंदर भी एकबारगी शरमा जाए...!
खूबसूरती इतनी की चाँद को भी रश्क हो .... ! यहाँ अदाकारा ऐसी- ऐसी की हेमामालिनी भी सोच में पड़ जाए...! नाचने में हुनर इतना की 100 घुंघरुओं में से एक घुंघरू से आवाज निकाल सके...!! फिर भी जिस्म से लेकर रूह तक लहूलुहान ....वो भी इतना की दर्द को भी रोना आ जाये..! फिर भी अपने दर्द अपनी अरूआइल उदासी को समेट कर ओढ़ लेती मुस्कान ...नाचती रहती रात भर 9 गज लम्बी में साड़ी में ..चुनती रहती एक एक पैसे ..!
यहां पत्नी बनने की खुशी के आगे तो दुनिया की हर खुशी बेमानी हो जाती....! इसलिए यहाँ समर्पण में लेखक ने लिखा भी..."मेरी माँ अच्छी माँ तो नही बन पाइ पर आदर्श पत्नी बन जीती रहीं"।।
ये कहानी है जीजी उसके सौतेले भाई कोडिम्बा उसकी छह बेटियों और कोल्हाटी समुदाय की।
किशोर की माँ शांता जो पढ़ी लिखी है सातवीं पास हो जाती तो शायद मास्टरनी बन जाती...पर उसके खुद के पिता ने उसे नाचने पर मजबूर कर दिया..सुंदर थी इसलिए शादी होने नही दी..! कभी इस पग में कभी उस पग में बंधती ही रही..नतीजा दो बच्चे ..! किशोर और दीपक। शांता और सुशीला का गाने नाचने में नाम हो रहा था ..लोग पैसे लुटा रहे थे. इन्ही तमाशबीनों में कृष्णरावडकर नामक शख्स शांता के पीछे पड़ जाता कि शादी कर लो रानी बना कर रखूंगा। कालांतर में शांता भाग जाती अपने छह महीने के बच्चे दीपक को लेकर ...और मंदिर में कृष्णराव वडकर (जिसे लोग नाना बुलाते)से शादी कर लेती ।यहाँ रह जाता अकेला ३साल का किशोर ..बिन माँ का बच्चा !!बिन माँ के बच्चे की क्या स्थिति होती है ...ये वो बच्चा ही बता सकता जिसके पास माँ नही होती..! सारे घर के काम इस छोटे से बच्चे के जिम्मे ..! सारि डाँट फटकार भी इसी बच्चे के नाम किसी ने चोरी की तो इल्जाम भी इसके नाम ...! बस थोड़ा सा प्यार मिलता तो जीजी से जिसका कभी रुतबा था जिसके नाम 25 एकड़ जमीन है और आज उन खेतों की रखवाली का जिम्मा ...!
किशोर को पढ़ने की अदम्य इच्छा
सारे काम करके भी अपनी पढ़ाई से नही भागता ...! यहाँ तक कि वो अपने कॉपी किताब का भी इंतजाम कभी घास काट कर कभी किसी का कुछ और काम कर के कर लेता..स्वाभिमान भी इतना कि जिससे भी कुछ मदद लेता बदले में उनका काम कर देता...! अंधेरी स्याह रातों में भी जीजी के खाना पहूचाने की जिम्मेवारी भी इसके मासूम कंधों पर ... डर कर भी पहुँचता किशोर वहाँ क्योकि वहीं कुछ प्यार, कुछ पल पढ़ने को मिल पाते । उसके नाजुक कंधों पर दुनिया भर का बोझ ।जब बच्चे अपनी मां के आंचल में लोरियां सुन कर सो रहे होते तो वो लोगों के पैर दबा रहा होता.. बुखार से तपता भी रहता ..पर काम कभी कम नही रहता । उसके पास दुनिया का कोई सुख नही था ..बस था तो डाँट -फटकार और मार !!फिर भी पढ़ता रहा ,बढ़ता रहा ..एक एक कदम बढ़ा कर ...! हमेशा माँ के सपने देखता ।अपने सपनों में ही माँ की गोद नसीब होती उसे ...!
बाद में सातवीं पास कर अपनी माँ के पास रहने आया ..ये क्या माँ भी कौन सी सुखी...!!गौशाले के पास के कमरे में जिसकी छत टीन की उसी के बगल में आटा चक्की चलती ..इसकी माँ छोटे से कमरे में रहती आधे में रहना-सोना, आधे में खाना, नहाना! नाना (कृष्ण राव वडकर )की रोज मार पीट गाली गलौज, जिसने रानी बना कर रखने का ख्वाब दिखाया और अब नौकरानी सी भी हैसियत नही। माँ का ये हाल देखकर किशोर बिलख उठा पर अभी कुछ करने योग्य नही था इसकी जिंदगी में बस संघर्ष ही था लिखा. यहाँ भी उसके जिम्मे दुनिया भर का काम होता ।आता चक्की के हिसाब से लेके घर के छोटे बड़े काम भी ....माँ भी दीपक को ज्यादा प्यार करती उसके लिए सेव मेवे किशोर से ही मंगवाती पर इसके हिस्से में कभी कभार ही मिल पाता, फिर भी खुश था अभागा की सामने माँ तो है नजर भर देख तो सकता। बस एक धुन पढ़ने की अपने समाज को नई दिशा देने की क्योकि उसे पता था कि इंसान की सबसे अच्छी मित्र शिक्षा है,एक शिक्षित व्यक्ति ही सम्मान का पात्र होता है,शिक्षा सौंदर्य और यौवन को परास्त कर देती है !!
शिक्षित व्यक्ति तर्क से मात जब दे देता हैं,
अच्छे अच्छे का रूप निखरकर बाहर आता है ।
दोस्तों पूरी किताब कोल्हाटी समाज की औरतों के दर्द .. उनकी तकलीफ़ों की बेबाक बयानी है पढ़ते हुए बरबस याद आता ये गाना ..
"औरत ने जन्म दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाजार दिया. जब जी चाहा मचला कुचला, जब जी चाहा दुत्कार दिया."
बहूत सारी बातें ऐसी की बरबस आंखों में आँसू आते हैं.. रोम रोम सिहर जाता ..!! किशोर की तकलीफ देख कर दिल रो उठता .....! कभी न समझ आती जिंदगी,कभी सम्भल नही पाती जीन्दगी ..कभी बस लगता तिनके सी बह रही उसकी जिंदगी, पर फिर गिरता -पड़ता उठ खड़ा होता, अपनी मंजिल को पाने में दिन रात एक कर देता...!! ग्रांट मेडिकल कॉलेज की सीढ़ियां भी चढ़ जाता है ...सूखे बंजर में हरियाली का एहसास होता है फिर भी क्या सब कुछ इतना आसान है...नही !
छात्रावास में इतना तंग किया जाता था..कभी किताबें चुरा ली जाती कभी रात में दरवाजा पीटा जाता ..कोई कमरे के आगे थूक जाता और ये बच्चा प्रतिरोध करना नही जानता था नही करता था ..रखैल का बेटा जो था ..बचपन से ही दबा सहमा...!!यहां के कुछ लड़कों को पता चल गया कि ये किस समाज से है तो वो सब चिढ़ाते ..चल अपनी मौसी से मिला दे ..बहन से...उफ़्फ़!! क्या स्थिति होती होगी ? उस समाज से है तो क्या ये किशोर का दोष था ? क्या उसने चुना था ये परिवार ? उस गुनाह की सजा इसे मिलती जो इसने किया ही नही ।कैसा ये समाज की लोग कर्म के बजाय जन्म से पहचानते हैं। हर पन्ना बस संघर्ष की अलग दास्तान ..पैसों के लिए , अपनी मां के लिए उसके इलाज के लिए , अपने भाई के लिए संघर्ष..! फिर भी सारा कुछ झेलकर ,अपनी मंजिल से विमुख नही होता। क्योकि वो जनता है कि सफलता का कोई शॉर्टकट नही होता ।कुछ कर गुजरने की क्षमता है तो खुद पे विश्वास रखना ही होगा पूरी निष्ठा और लगन से जुटना ही होगा अपने सपनों को साकार करने में और फिर किशोर एम.बी .बीएस की परीक्षा उतीर्ण कर लेता...!
आज छोटी -छोटी बातों पर बच्चे आत्महत्या कर लेते ..जिंदगी में संघर्ष थोड़े से आये नही की संघर्ष करने के बजाय जिंदगी ही खत्म कर लेते.....क्योकि उन्हें सफलता का शॉर्टकट चाहिए..संघर्ष कभी किया नही।ये जीवनी हर उस आदमी के लिए प्रेरक है जो थोड़े से संघर्ष में हौसला हार जाते।
पूरी किताब पढ़ने के बाद आप ये कह नही सकेंगे कभी की ये ऑपरचुनिटी मुझे नही मिली इस लिए ये काम मैं नही कर पाया..! परिस्थितियों को दोष देना बंद कर देंगे आप ...!
परेशानियों से भागना आसान होता है।
हर मुश्किल इक इम्तहान होता है।
हिम्मत हारने वालों को कुछ नही मिलताहै और मुश्किल से लड़नेवालों के कदमो में जहाँ होता है!!
राख -राख होती जिंदगी में से खुद को खरा सिद्ध करने की जिद का नाम ही है " छोरा कोल्हाटी का"
दोस्तों ,महज 159 पृष्ठ की ये किताब जिंदगी के बहूत से रंग रूप दिखाती..!!लड़ने का हौसला सीखा जाती!!
आशा करती हूँ आपको पसंद आएगी !
"छोरा कोल्हाटी का"
लेखक : किशोर शांताबाई काले
हिंदी अनुवाद: अरुंधति देवस्थले
राधाकृष्ण प्रकाशन
पृष्ट संख्या ..159
मूल्य..95//
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News Digital India 18

पाठकों के सुझाव सदा हमारे लिए महत्वपूर्ण है ..

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