कविता हो और लड़कियाँ न हों तो जैसे प्रेम प्रतिनिधित्व रहित हो जाता है

ज्यों - ज्यों बूड़े श्याम रंग : एक नदी जामुनी-सी

समीक्षक : असित कुमार मिश्र, बलिया
जीवन के विविध रंग हैं और विविध भाव भी।एक ही समय में विदा हो रही बेटी का कारुणिक गान अगर किसी आँगन में क्रंदन कर रहा होगा तो दूर किसी दरवाज़े पर वध्वागमन का गान भी गुँजारित हो रहा होगा। किसी की अंतिम विदाई की तैयारियाँ हो रही होंगी तो कहीं सोहर के सुमधुर गान से प्रथम आगमन का स्वागत भी। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि, जीवन के इन विभिन्न रंगों और भावों को अभिव्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम कविता ही है।
समकालीन कविता में कुछ हस्ताक्षर ऐसे हैं, जो जीवन के इन विविध भावों में अपनी कविता से रंग भर रहे हैं। उनमें मालिनी गौतम का रंग सबसे गाढ़ा और 'जामुनी' है। शायद इसीलिए इनके कविता संग्रह का नाम है "एक नदी जामुनी- सी" । साहित्य में 'जामुनी' रंग नया नहीं है, 'मेघदूतम्' में यक्षिणी भी ऐसी ही है -
तन्वी श्यामा शिखरिदशना पक्वबिम्बाधरोष्ठी,
मध्ये क्षामा चकितहरिणीप्रेक्षणा निम्ननाभि:।
लेकिन यह श्याम रंग यक्षिणी के तन्वङ्गी होने, नुकीले दाँतों और त्रिकोल (बिम्ब फल) के जैसे अधरों तथा क्षीण कटि जैसे उपमानों के आगे टिक नहीं पाता।
प्राय: मेघदूत के किसी भी अनुवाद या भावानुवाद में इस श्लोक में आए शब्द 'श्यामा' की व्याख्या नहीं की गई है । शायद इसके पीछे कोई साहित्यिक रूढ़ि चली आ रही हो, जहाँ राम को तो श्याम वर्ण होने की अनुमति है, लेकिन सीता को 'चामर - सी, चंदन - सी, चंद्रिका - सी' ही होना है। कान्हा जिनका नाम ही कृष्ण है, वो भी सवाल करते हैं तो यही कि - 'राधा क्यों गोरी, मैं क्यों काला' ?
लेकिन मालिनी गौतम ने अपने शीर्षक कविता में ही इस रूढ़ि पर प्रहार किया है -
शायद तुम्हें अब भी है इंतज़ार
अधपके जामुन के रंग वाली उस नदी का
जो साँझ ढले तुम्हारी लाल आँखों में
देखकर ख़ुद का अक्स
मारे शर्म के हो जाती थी और भी जामुनी...।
यहाँ 'और भी जामुनी' कह कर जिस कलात्मकता से 'जामुनी रंग' की नायिका को और भी जामुनी बना दिया गया है, उस से जामुनी रंग और गाढ़ा तो हुआ ही है कविता में भाव भी बढ़ गए हैं।
केवल प्रेम ही नहीं इस उपभोक्तावादी दौर में मालिनी गौतम बदलते संबंधों, मूल्यों, दायित्वों और चेहरों को भी बड़ी सूक्ष्मता से न केवल देख रही हैं,बल्कि नवीन बिम्ब - प्रतीकों के साथ लिख भी रही हैं -
सिर्फ प्रेम में जीना
शायद डायबीटिक होता है उसके लिए
तभी तो बड़े ही सहज रूप से
वह कभी-कभी
नमकीन - सा फ्लर्ट भी कर लेता है
उसके लिए ज़रूरी होता है
हर हाल में
स्वयं के अस्तित्व को बचाए रखना
वो रखता है स्वयं को ज़िन्दा
प्रेम को मिटा कर भी...।
एक नदी का प्रेम में 'जामुनी' हो जाना यही तो है जब वो प्रेम में आए सभी छल - कपट, उतार-चढ़ाव को प्रेमी की आँखों में आँखें डालकर कह भी सकती है और उसे 'कुमार्गी' होने से बचा भी सकती है। इतना धैर्य,इतनी तन्मयता और इतना समर्पण 'प्रेम में होना' शीर्षक कविता में ही दिख सकता है वर्ना इस दौड़ती - भागती दुनिया में साहिर की एक नज़्म - 'चलो एक बार फिर से अज़नबी बन जाएँ हम दोनों' ...गुनगुनाने में कितनी देर लगती है!
सामान्यतया प्रेम लिखने वाले लोग युवा पीढ़ी के अन्य समस्याओं जैसे तनाव, सामाजिक विषमताओं और दिशाहीनता की स्थिति से आँखें बचाकर निकलता चाहते हैं, लेकिन मालिनी गौतम अध्यापिका हैं और उन्होंने 'हार द्रोणाचार्य की' कविता में यह सिद्ध भी किया है कि 'पेशे से' अध्यापिका होने और 'कर्त्तव्य से' अध्यापिका होने में अंतर होता है। तभी जहाँ एक 'अर्जुन' की असफलता उन्हें अपनी और पूरे शिक्षा प्रणाली की विफलता लगने लगती है।और यह स्थिति उन्हें कचोटती ही नहीं बल्कि व्यवस्था पर पुनर्विचार के लिए जाग्रत भी करती है -
किन हालात ने बना दिया
अर्जुन को विक्षिप्त?
ऐसे कितने ही प्रश्न
मुझे चीर कर भटकते हैं वातावरण में
और पहाड़ों से टकरा कर
वापस लौट आते हैं....
और मैं...
अर्जुन की अध्यापक
इन प्रश्नों के बोझ से
दबी - दबी - सी
हर बार पाती हूँ कहीं न कहीं
स्वयं को दोषी
अर्जुन की इस अवस्था के लिए...।
प्रेम का एक रंग यह भी है जब मनुष्य अपने से जुड़े लोगों का ही नहीं बल्कि सबका हित सोचने लगता है।
व्यक्त करने और कह देने में अंतर है। जैसा कि केदारनाथ सिंह ने कहा था कि - मैं बहस शुरू तो करूँ
पर चीज़ें, एक ऐसे दौर से गुज़र रही हैं
कि सामने की मेज़ को
सीधे मेज़ कहना
उसे वहाँ से उठाकर
अज्ञात अपराधियों के बीच में रख देना है।
लेकिन यह हिम्मत की है मालिनी गौतम ने 'बदलते रंग' कविता में -
कभी सिर उठाकर
मन के आइने में
देखो तो अपना चेहरा
नफ़रत होने लगेगी तुम्हें
अपने इस बदलते रूप से...।
कह देने की शायद यह ताकत वह नहीं है जिसे धूमिल ने 'किसी बौखलाए हुए आदमी का संक्षिप्त एकालाप' कहा था बल्कि यह पहले वही एक 'सार्थक वक्तव्य है' जिसे धूमिल ने 'भाषा में आदमी होने की तमीज़' भी कही थी।
आधुनिक युग की क्षणवादिता जीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर रही है। इस दौर में कुछ भी सुरक्षित नहीं। न व्यक्ति न समाज न ही पारिवारिक मूल्य। विघटित होते रहना जैसे नीयति ही बन गई है। इस कठिनतम समय में 'मैं और कविता' की यह पंक्तियाँ कितनी ऊर्जा से लिखी गई होंगी -
अपना सब कुछ खोकर भी
मैं बचाना चाहती हूँ
मेरी कविता... मेरी कविताई...।
कवयित्री की कविता के प्रति यह प्रतिबद्धता और जिजीविषा बताती है कि कविता उसके लिए 'राधा-कृष्ण को सुमिरन को बहानो' नहीं है, बल्कि जीवन की विसंगतियों और कुव्यवस्थाओं से लड़ते रहने का हथियार भी है। इस लड़ाई में नियति की क्रूरता दृष्टव्य है -
कोयल की कूक को
अपने रेतीले प्रहार से
भयभीत बनाता...
मेरे अंदर उगता बसंत
खड़ा है किसी कोने में भयभीत।
इन कविताओं में जगह-जगह अमलतास भी है, गौरैया भी है, आसमान भी है, बरसात भी है लेकिन दूर कहीं क्षितिज में एक टूटता तारा भी है। यह कितना अभिशप्त सत्य है हमारे समय का कि, कोई रेगिस्तान है हमारे भीतर जो हमें हमारी जड़ों से काट रहा है। कोयल की कूक और अमलतास के फूलों को देखते हुए भी हृदय में हूक नहीं उठती। जैसा कि 'टूटता तारा' में -
सदियाँ बीत गयीं
टूटते तारे के इंतज़ार में...
इन पथरीली आँखों ने अब जाना
कि तारे टूटकर गिरते ही नहीं
इस दुनिया में कहीं भी...।
कविता हो और लड़कियाँ न हों तो जैसे प्रेम प्रतिनिधित्व रहित हो जाता है। लड़कियाँ यहाँ भी हैं लेकिन वो 'लड़कियाँ बदली - बदली सी'। वो कभी 'बूढ़ी काकी' पढ़ती हैं तो कभी 'वह तोड़ती पत्थर'। कभी शेक्सपियर की' साॅलिलोकीज़' या वर्डस्वर्थ की 'डैफोडिल'। वो न केवल पाइथागोरस के प्रमेयों से लड़ती हैं बल्कि अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर की क्लास में लड़कों को' धकिया कर' सबसे आगे वाली बेंच पर भी बैठ जाती हैं। लेकिन घर आते ही जैसे सब कुछ बदल जाता है उनके लिए । अब उन्हें दुपट्टे का भी ख्याल है कदमों के सधेपन का भी। सारे कहकहे - खुशियांँ ठहाके जैसे कहीं खो जाते हैं। फिर सामाजिक बंधन की कैद में आहुति देतीं लड़कियाँ हैं और उस सुबह का इंतज़ार है जिसमें फिर क्लास वाली उन्मुक्तता होगी।इस कविता में स्त्री है और विमर्श भी है लेकिन कहीं भी वह विमर्श अपने स्त्री होने की गरिमा से नीचे नहीं उतरता। और न ही उन्मुक्तता की आड़ में उच्छृंखल ही होता है।
मालिनी गौतम की विशेषता यही है कि वो विशेष हैं ही नहीं। गिरना, टूटना, संभलना और उदासी जैसी छोटी - छोटी बातें उन्हें भी वैसे ही प्रभावित करती हैं जैसे किसी साधारण व्यक्ति को। जैसा कि दस्तक कविता में -
यहाँ तकिये के नीचे
अब भी तोड़ रहे हैं दम
सूखे फूल और पत्तियाँ
बिस्तर से अब भी लिपटी हुई है
एक छिली हुई आत्मा।
छिली हुई आत्मा का यही दर्द उनके प्रेम को लौकिक रहने देता है। और जल्दी ही 'छिली हुई आत्मा' के साथ पुनः सर्जन की ओर उत्प्रेरित कर देता है -
जानती हूँ कि एक दिन
एक बड़ी - सी लहर
इसे भी बहा कर ले जाएगी
तो क्या हुआ...?
विसर्जन ही तो सर्जन की शुरुआत है।
यह काव्य संग्रह इनका दूसरा संकलन है। इसके पहले भी 'बूँद - बूँद अहसास' लिख कर कविता में दस्तक दे चुकी हैं। अगर इसे 'सर्जन की शुरुआत' कहा जा सके तो मालिनी गौतम की कविताएँ हिन्दी कविता के क्षेत्र में विशेष उम्मीद जगाती हुई सी दिख रही हैं।
एक नदी जामुनी - सी : मालिनी गौतम (बोधि प्रकाशन जयपुर)
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