मेरा इल्म


@ पंकज त्रिवेदी 
मैंने जब एक पौधा बोया था
तब एक सपना भी देखा था
पारिजात का पौधा और 
एक वटवृक्ष...
जिसकी सुगंध मेरे मस्तिष्क में
 इस तरह फैल जाएँ कि
पूरे दिन की थकान उतर जाएँ 

उसके फूलों की खुश्बू से....

घर आते ही झूले पर दिनभर की
डाक और कुरियर से आई सामग्री
देखने को उतावला मन खुशी से
झूम उठे किसी अच्छी खबर को
पढते हुए और मन को शांति मिले
कि मैंने अपनी मुठ्ठी में लिए चंद
शब्दों की तितलियों को
जो आसमान दिया है वो पर्याप्त हैं
मेरी कलम के शब्द किसी की
ज़िंदगी को बसर करने का जरिया बनें
किसी के बुरे वक्त की ताकत बनें या फिर
बेटी को विदा करते बाप का सुकून बनें और
जीवन के कुछ अनछुए लम्हों की तसवीर बनें
जिसके सपने देखते रहते हैं हम ...
मेरे अंतर से उभरती संवेदनाओं का पुट
किसी के ज़हन में अच्छे विचार का
दीप जलाएं और ज़िंदगी की दौड़ में वो
अपने ही बलबूते पर सहज तरलता से
आगे बढते हुए पहचान बनाएँ...
और वो भी शाम को घर लौटकर
अपने आँगन में देखें तो उसके चाहने वालों की
ऊष्मा और प्यार से सराबोर हो जाएँ
जो उसे फिर से एकबार इंसानी रूप में
जन्म लेने को आश्वस्त करें
अगर समय की डोर टूट भी जाएँ तो
ईश्वर से कह सकें कि
आपने जो ज़िम्मा दिया था मुझे
उस कार्य को सम्पन्न करके आया हूँ मैं
उसका गौरवान्वित चेहरा देख ईश्वर भी
सर उठाकर इल्म पर मुस्कुराता रहें... 
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News Digital India 18

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