न जाने क्यों



- वन्दना पाण्डेय, पटना 

न जाने क्यों तेरी सूरत शुकून देती है मुझे 
न जाने क्यों तेरे ख्यालों में खो जाती हूँ 
जब भी सोचती हूँ गुजरी बातें 
तेरा चेहरा मुस्कुराता नजर आता है मुझे 
मुझे मालूम नहीं तेरा मेरा क्या रिश्ता है 
क्यों तेरी बातें रूह तक उतर जाती हैं 
क्यों तेरी बातें अपनी अपनी सी लगती हैं मुझे 
क्यों तेरी तसव्वुर से तड़प बढ जाती है 
क्यों नहीं मैं कभी भूल पाती हूँ तुम्हें 
क्यों मुझे घेरे रहते हैं तेरे चाहतों के घेरे 
ये मेरे ख्वाब मुझे इसका सबब तो नहीं 
गर इल्म हो तुमको तो मुझे भी इत्तला करना 
मेरी उम्मीदों को शायद यकिन मिल जाए 
अंधेरे में न रहूँ मैं ख्वाब को रौशन करना.



 
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