सपनों से परे


- सुरेखा अग्रवाल, लखनऊ

रास्ते भागे, अक्सर उलझे
कदमों से हारे, समय से भागे
जिस्त से हारते, लफ्ज़ो से मुखरते ख्वाहिशें, उलझने ले जाएं कहाँ, यह उजाले और अँधेरे
सपनों से परे रौशनी में ढूंढते सपनों के सितारे अंदर अँधेरा,
रौशनी को टटोले
यह उलझनें यह रास्ते, यह सपने अक्सर ढूंढते
मंजिलों के निशां

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News Digital India 18

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