जब शब्द लेने लगते सन्यास और ...



- रश्मि रानी, पटना  


जब 
शब्द मौन होते हैं
तो मुखरित होती हैं
संवेदनाएं
भावनाओं और अनुभूतियों में
- रश्मि रानी, पटना  
खोने लगते हैं शब्द 
कल्पना और यथार्थ में
जैसे
तुम्हारे होने और न होने में
खींच लेती है
वो आभाषी रेखा
जिसमें
अवनि और अम्बर
हो जाते एकाकार
क्षितिज के पार
तब शब्द ढूंढ लेते
अपरिमित आकाश
जैसे 
अमावस और पूनम में
जागृत और स्वप्न में
होते हो तुम
खुली और अधखुली पलकों में
जैसे 
प्रार्थना और प्रयत्न में
बहने लगते हैं शब्द
'राधा' और 'धारा' के बीच
सहज और असहज भाव में
जैसे जड़ और चेतन में
तब मन होता मौन
शब्द लेने लगते
सन्यास
और लीन हो जाता
समाधि में 


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