जब मैंने, मेरी उस दोस्त के साथ न्याय किया

सीआरपीसी की धारा 97-98, हम क्या नहीं कर सकते?



                                                       - श्रीमती लक्ष्मी गामड़
                                                                                       संयुक्त कलेक्टर, रतलाम 

"पहला केस मैने 1998 में देखा था। मुझे आज भी एक-एक बात अच्छे से याद है। मेरी बचपन की सहेली जिसकी 

ससुराल में बहुत समस्या चल रही थी। उसे बार-बार मारपीट के उसका छोटा बेटा छीन के भगा दिया जाता था। 

ऐसे ही जब एक बार उसे बहुत मारा और उसका 2 साल का बेटा उन लोगों ने छीन के उसे भगा दिया।"

मुझे अभी रतलाम आएं हुए करीब 1 माह का समय हो गया हैं। पर आश्चर्यजनक रूप से अब भी मेरे पिछले कार्यक्षेत्र से रोज ही 2-3 कॉल आ जाते हैं। ये इस बात का धोतक है कि लोग आपको और आपके काम को याद रखते हैं तथा उन्हें लगता है कि हमारा काम वो सर कर देंगे। मैं खुश हूँ कि मैं अपनी ही कसौटी पर खरी उतरती रहती हूं और जब भी कमी लगती है, स्वयं ही सुधार करने का हमेशा प्रयास करती हूँ। हम लोगों का काम ही हमें नई पहचान दिलाता है और नाकामी, मक्कारी, पक्षपाती रवैया ही गर्त में ले जाता है।
ऐसे ही आज दोपहर को खिलचीपुर से मेरे पास एक फोन आया किसी महिला का थाl  रोते हुए कह रही थी, साहब मेरी बेटी को बचा लोl उसकी ससुराल वालों ने उसे घर में बंद करके रखा हुआ है, हमको किसी को भी उससे मिलने नही दिया जा रहा हैं। मैने उसे समझाने की कोशिश की, पर उसने एक ही रट लगा ली। सर कुछ करो। मैने उसे कहा तुम थाने चली जाओ। वो फिर रोते हुए बोली - सर कोई नही सुनता, बस मुझे आप पर ही भरोसा है। मैने उसे कहा-लेकिन मेरी तो 5 माह पहले ही वहाँ से बदली हो गई है, वो रोते हुए फिर बोली -सर आप ही कुछ कर सकते हो। जैसे तैसे फोन काटा। पर मन बहुत भारी हो गया था। उसकी तकलीफ़ ने मुझे भी हिला दिया था। कभी-कभी आपकी संवेदनशीलता आपके लिए कठिन हो जाती है। हम रेवेन्यू के ऑफ़िसर्स को मजिस्ट्रियल पॉवर मिले होते हैं कि हम क्रिमिनल प्रक्रिया संहिता की धारा 97-98 के केस को सुने व सही निर्णय देवें।
आप सभी को ये उत्सुकता होगी कि ये धारा 97-98 में क्या होता है? बहुत बारी तो हमारे बंधू भी इसे पूरी तरह नही समझते और कुछ तो भी आदेश कर देते हैं। और बहुत सारे लोग इसके भुक्तभोगी भी होंगे।इसमें बड़ी समझदारी से निष्पक्ष आदेश ही करना चाहिए। अब तक के कार्यकाल में बहुत फैसले करने का मौका मिला और कोशिश रही हमेशा सही करु।
धारा 97 में सदोष परिरुद्ध व्यक्तियों के लिए तलाशी लेने हेतु सर्च वारंट जारी किया जाता है। मतलब जब आप को ये विनिश्चिय हो जाएं तो ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए चाहे वो महिला हो या पुरुष अगर उसे किसी ने जबर्दस्ती रोक के रखा हो तो यह अपराध की श्रेणी में आता है। और इस हेतु मजिस्ट्रेट सर्च वारंट जारी कर उसकी तलाश कर अपने समक्ष उपस्थित करने हेतु थाना प्रभारी को आदेशित करता है। और हाँ एक बात और बताना चाहूँगी बच्चों के केस में अगर उसके पिता ने बच्चे को जबर्दस्ती छुपा के रखा हो और बच्चे की आयु 5 वर्ष या उससे कम हैं तभी आप उसे सर्च करवाएंगे और उसे माँ को दे सकते हो अगर बच्चा 5 वर्ष से अधिक आयु का है तो उसे सिविल कोर्ट सुनेगी आप नही। पर नियमो के ज्ञान के अभाव में गलत निर्णय भी दे दिए जाते हैं।
धारा 98 में अपहृत स्त्रियों को वापस करने के लिए विवश करने की शक्ति, मतलब किसी भी स्त्री या 18 वर्ष से कम आयु की बालिका का अपहरण कर उसे परिरुद्ध कर लिया गया हो तो यह अपराध की श्रेणी में आता है। इस हेतु सर्च वारंट जारी कर धारा 97 की तरह ही समक्ष में प्रस्तुत करना होता है।
अधिकतर मैने देखा है जब भी हमारे अधिकारी बन्धु ऐसे आवेदन आते हैं तो वो इसे पूर्णतः जाँच नही करते हैंl  बस जो वकील कहते हैं, उसी तरह आदेश भी कर देते हैं। आपको मैं ऐसे ही दो-तीन फैसलों से रूबरू करवाती हूँ।
पहला केस मैने 1998 में देखा था। मुझे आज भी एक-एक बात अच्छे से याद है। मेरी बचपन की सहेली जिसकी ससुराल में बहुत समस्या चल रही थी। उसे बार-बार मारपीट के उसका छोटा बेटा छीन के भगा दिया जाता था। ऐसे ही जब एक बार उसे बहुत मारा और उसका 2 साल का बेटा उन लोगों ने छीन के उसे भगा दिया। वो मेरे पास आई मुझे कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या करूँ? उस समय मैं धारा 97-98 के बारे में कभी ठीक से सुनी नही थी। 
हम एक वकील से मिलेl उसी ने धारा 97 का आवेदन बनवाया और SDM कोर्ट में लगा दिया। बड़ी मशक्कत के बाद 8-10 दिन बाद वारंट जारी हुआ। जानते हो उस बेचारी ने उस दौर में वकील साहेबान की फीस 25 हजार रूपये अपनी ज्वैलरी बेच कर दी थी। और फैसला उन लोगों के पक्ष में हुआ। कैसे हुआ, मुझे बताने की जरूरत नही, क्योंकि हम लोगों का ज़मीर तो दो कौड़ी में खरीदा जा सकता है और हम बड़ी आसानी से बिक भी जाते हैंl वास्तव में हम ही लोग बिकाऊ हो गए तो खरीदार क्यों पीछे रहेंगे। कहते हैं कि जब व्यक्ति न्याय की कुर्सी पर बैठा हो तो न्याय ही करता है, पर मैने तो उसे बिकते देखा है और न्याय को चांदी के जूते सर पर रखते देखा है। 
मेरी दोस्त हार गई थी, उसका पुत्र उसे नही मिला था। पर हमने हार नही मानी और हम सिविल कोर्ट गये जहाँ हम लोग केस जीते और आज भी वो लड़का अपनी माँ के साथ रहता हैं। भले ही हमने केस लड़ने के लिए 2 बीघा जमीन बेच दी। अगर उस समय सही फैसला होता तो शायद बात कुछ और ही होती। इस एक फैसले ने मेरी आँखे ख़ौल दी थी। जब मैं SDM बनी तो मुझे ये अनुभव बहुत काम आया। मैने इस धारा को बहुत गम्भीरता से पढ़ा। इसी का नतीजा है कि आज तक ऐसे फैसले जब भी करने का अवसर आता हैं तो कोशिश करती हूं कि गलत ना हो।
दूसरा केस मन्दसौर का हैं। ऐसे ही एक दिन मैं ऑफिस से निकली ही थी कि दीपक बरसोलिया जी आ गए एक आवेदन लेकर 98 का एक लड़की जिसने लव मैरिज की थी और उसके परिजन ने उसे परिरुद्ध कर रखा था। मैंने परिक्षण कर वारंट जारी किया। जब थाना प्रभारी उसे लेकर आया तो लड़की ने अपने पति के साथ रहना स्वीकार किया। इस बात से यह सीखा जा सकता है कि एक बार जरूर दोनों पक्षो को सुनना चाहिए। आज भी वो दोनों बच्चे बेहद खुश हैं।
तीसरा केस सुसनेर का है, जब एक मुस्लिम महिला जो 23-24 वर्ष की होगी, दिखने में एकदम फटेहाल या यूँ कहिये वकील को देने के लिए 100 रूपये भी नही होंगे। बस मेरे पैरों में गिर पड़ी। मैने अपने रीडर से आवेदन बनवा के तैयार करवाया और वारंट जारी किया उसके 6 माह के बच्चे को सर्च करवाने के लिए। अब हमारे सामने चेलेंज था राजस्थान के एक गाँव से खोज के लाने का क्योंकि स्टेट अलग था। पर धन्यवाद उस थाना प्रभारी को वो उस बच्चे को 3 दिन में खोज लाये। और जब फैसला सुनाया गया तो दो लोगों की आँख में आंसू थे एक उस महिला के और एक मेरे। एक के ख़ुशी के आँसू थे और मेरे सुकून के, क्योंकि मैंने आज मेरी उस दोस्त के साथ न्याय किया था, जो कभी मेरी अनभिज्ञता से हार गई थी। और आज मैने किसी गरीब की 2 बीघा जमीन बचा ली थी।
और जाने से पहले
"अगर जीवन में जब भी किसी के लिए कुछ करना चाहो तो ये जरूर सोचना कि अगर इस जगह हम होते तो क्या ये हमारे लिए सही है? बस कभी गलत फ़ैसला नहीं होगा।"
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