घटना 'एक्सीडेंट' है तो सौ सलाम और अगर एक्सीडेंट नहीं है तो हजारों सलाम ...

जितने आईटीआई, बीटेक, आईआईटी, बी एड, बीटीसी, बी ए, एम ए डिग्री होल्डर जमा हो रहे हैं एक जगह, उस जगह जल्दी ही भूकम्प आएगा। यह सभी दलों पार्टियों के लिए चुनौती है। सरकारें ध्यान नहीं दे रहीं हैं लेकिन हम खतरनाक तेजी से खतरनाक दिशा में बढ़ रहे हैं। यह दिशा नक्सलवाद की भी हो सकती है चोरी डकैती अपहरण जालसाजी की भी हो सकती है। अगर आप खुद को विधानसभा की चहारदीवारी में सुरक्षित मान रहे हैं तो बस एक दशक तक। अगले दशक में उत्तर प्रदेश का भूखा शिक्षित नौजवान आपकी राजनीति का वैसे ही बलात्कार करेगा जैसे आज आप जनता का बलात्कार कर रहे हैं। सभी दलों के साथ साथ जनता को भी सोचना होगा इस तरफ कि हम किसे और क्यों चुन रहे हैं? नहीं तो नेताओं के प्रति जिस तरह उत्तर प्रदेश में नकारात्मक छवि बन रही है, वह दिन दूर नहीं जब भीड़ किसी नेता को चौराहे पर पीट पीट कर मार डालेगी और हम फेसबुक पर चर्चा करेंगे कि अगर यह घटना 'एक्सीडेंट' है तो,सौ सलाम और अगर एक्सीडेंट नहीं है तो हजारों सलाम...
                                                        - असित कुमार मिश्र, बलिया

ड़ा अजीब है फेसबुक। साल भर पुरानी उन यादों को दुबारा दिखा देता है, जिन्हें हमने कभी यहाँ दर्ज़ किया था। लेकिन उन यादों को नहीं दिखा पाता जो सीने में कहीं गहरे दफ्न हो गई हैं। 
वो भी शायद यही महीना था, हल्की-फुल्की ठंड पड़ रही थी। मैं बलिया के नेशनल बुक डिपो से कुछ किताबें लेकर सीढ़ियाँ उतर रहा था तभी सामने सफेद अंबेसडर गाड़ी रुकी। काला शीशा गिरा और चेहरे ने हल्का सा झांक कर कहा था- असित भाई फेसबुक वाले हैं न आप? सहसा मैं कुछ कह नहीं पाया सीजेएम जज के सामने। न्यायाधीश के सामने तो यूँ ही आदमी खुद को मुजरिम समझने लगता है तिस पर हम ठहरे प्रखर बेरोजगार। खैर उनका आकस्मिक निमंत्रण स्वीकार करते हुए मैं उनके आवास पर पहुंचा। चाय नाश्ते के दौरान घंटों न्याय, दर्शन, साहित्य और अध्यात्म पर बातें हुईं। बाबा फरीद और जायसी के दोहे-चौपाइयों में उलझते हुए हम कभी इस कमरे में तो कभी उस कमरे में बैठते रहे। इसी बीच न जाने कब हमने लाॅन क्राॅस किया, गेट खोला बाहर निकले, और टहलते हुए किसी फुटपाथ वाली चाय की दुकान पर पहुँच गए कुछ याद ही नहीं।
होश तब आया जब चाय वाले ने कहा कि - चीनी वाला चाय रही कि बे चीनी वाला? 
सर ने कहा था - एक बिना चीनी वाला... हाँ तो असित मैं कह रहा था कि शेख फरीद पर व्यापक अनुसंधान की जरूरत है... 
तभी मेरी नजर सर के पैरों पर पड़ी और मैंने धीरे से कहा कि - सर आप बातों-बातों में चप्पल छोड़ आए हैं और अभी नंगे पाँव हैं। 
सर ने ठहाका लगाया और कहा - असित भाई! मीरा जब घर से निकली तो चप्पल पहनी थी? सिद्धार्थ जब घर से निकले तो चप्पल पहने थे? साहित्य में चप्पल कहाँ से आ गया? 
मैं खुद भी उनकी सहजता पर हँस पड़ा और हल्का मजाक करते हुए कहा कि सर पैसे हैं न कि वो भी छोड़ आए? 
सर ने कहा - यार मैं सीजेएम हूँ तुम्हारे जिले का। 
मैंने हँस कर कहा - चाय वाला सुन लेगा तो आपको 'हालावादी' समझ लेगा। इसने जीवन में कभी नंगे पाँव वाला जज नहीं देखा होगा। 
अभी हमने चाय का गिलास फेंका ही था कि एक सफेद स्विफ्ट गाड़ी रुकी मेरे ही उम्र के नौजवान ने हाथ उठाया - का हो असित भाई का हाल बा? 
मैंने पाँच सालों बाद उस दोस्त को देखा था। बातों-बातों में उन्होंने बताया कि वो एल टी में नियुक्त हो गए हैं और दहेज में यही गाड़ी मिली है। मैंने शुभकामनाएं दीं। तभी उन्होंने पूछा - असित भाई क्या चल रहा है आपका? 
मैंने आदतन कहा - वही तैयारी में हूँ। टीजीटी पीजीटी डाल रखा है 2011 वाला। बस प्रक्रिया पूरी हो तो मैं भी नौकरी पा जाऊँ... 
अचानक मित्र ने मेरी बात काटकर कहा - ठीक है असित भाई थोड़ा मन से तैयारी कीजिए... 
अच्छा था कि शाम का धुंधलापन छाने लगा था और मेरी आँखों की नमी न जज साहब ने देखी न मेरे उस नवनियुक्त अध्यापक मित्र ने। मैं तो जैसे वहीं पास के लकड़ी वाले ब्रेंच पर गिर ही गया। सर ने आश्चर्य से पूछा - अबे कौन था ये जो आपको समझा गया असित?
मैं बताना चाहता था कि सर ये मेरे मित्र हैं। इनके पिता जी का संस्कृत विद्यालय है वहीं से इन्होंने हाईस्कूल इंटर शास्त्री पास किया और रोहतक के एक कालेज से बी एड कर आए। टीईटी की परीक्षा में पास होने के लिए मुझसे नोट्स मांगते थे तभी एल टी की भर्ती आ गई और मैरिट पर इन्हें नियुक्ति मिल गई। जीवन में इन्होंने एक भी ओएमआर शीट नहीं भरी और आज ये मुझे समझा गए कि असित भाई थोड़ा मन से तैयारी कीजिए... 
लेकिन नहीं कहा मैंने कुछ। कुछ भी हो मेरे मित्र हैं वो। और उन्होंने जो भी कहा वो मेरे हित में ही था।
आज पौने पाँच साल बीत चुके हैं समाजवादी सरकार के।मुख्यमंत्री जी का 'दिग्विजय रथ' समाजवाद को पारिभाषित करते हुए सड़कों को रौंदता हुआ आगे बढ़ रहा है। मतलब जितना उन्हें करना था उन्होंने कर लिया। पता नहीं क्यों लग रहा है जैसे मैं एक साल पीछे पहुँच गया हूँ और जज साहब मुझे झकझोर कर पूछ रहे हैं - अबे कौन था ये जो आपको समझा गया असित? 
और मेरे मुँह से निकल रहा है - सर! यही तो समाजवाद है। उत्तर प्रदेश के शैक्षिक व्यवस्था का आपातकाल। प्राथमिक से लेकर राज्य विश्वविद्यालयों के शोध तक आपातकाल। जहाँ प्राथमिक विद्यालय में एक भर्ती (72825) पांच साल में पूरी न हो सकी। हर साल चालीस हजार बीटीसी और एक लाख बी एड की डिग्रियाँ बाहर आती हैं लेकिन नियोजन? 
सरकारी लूट का इससे बेहतर उदाहरण आपको विश्व में कहीं नहीं मिलेगा - जूनियर कला वर्ग में टीईटी के पाँच लाख फार्म पड़े हैं जबकि जूनियर कला वर्ग में सीधी भर्ती का प्रावधान ही नहीं।सभी पद प्रोन्नति से भरे जाएंगे। फिर फार्म क्यों भराए गए? इन पाँच लाख बेरोजगार युवाओं के पैसे कहाँ जाएंगे? 
एल टी में लगभग सात हजार पद आए थे। पहले ही लड़कों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि यह भर्ती परीक्षा पर हो या एल टी में टीईटी लागू किया जाए। लेकिन न सरकार ने सुनी न कोर्ट ने। और परिणाम? ऐसे बहुत से लोग अध्यापक बन गए जिन्होंने आज तक ओएमआर शीट देखा तक नहीं। और अत्यधिक धांधली के कारण भर्ती रोक दी गई। मैं कदापि यह नहीं कह रहा कि उसमें योग्य नहीं चुने गए लेकिन बहुत योग्य लोग बाहर ही रह गए वो भी बिना प्रतियोगिता के। 
आज शिक्षित युवा बात बात पर हिंदू मुसलमान कर रहा है। सामाजिक सौहार्द का गला घोंटने जैसा उदाहरण भी यहीं है। भाषा टीईटी के आधार पर उर्दू के अभ्यर्थियों को ढूंढ ढूंढ कर नौकरी दी गई और अंग्रेज़ी या संस्कृत के अभ्यर्थी आज भी भटक रहे हैं। तुष्टिकरण की इस घातक नीति ने युवाओं को हिंदू मुसलमान में बांट दिया। मैं बेहिचक कहूंगा कि उर्दू भाषा में अध्यापकों की भर्ती आवश्यक थी। लेकिन संस्कृत और अंग्रेज़ी में भी लड़के पास थे क्या नियोजन पर उनका हक नहीं? 
माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड ने 2010 के बाद कोई नियुक्ति नहीं की। केवल फार्म आते गए सदस्य बदलते गए। परीक्षा में गलत सवाल पूछ पूछ कर खानापूर्ति कर ली गई। 
उच्चतर आयोग के अध्यक्ष ने कल एक बयान में कहा कि- "हम गलत सवाल बनाने वाले एक्सपर्ट्स से फिर सवाल नहीं मांगेंगे।"
लेकिन हम कैसे जानेंगे कि कौन एक्सपर्ट सवाल गलत पूछा था? दो साल बाद फिर घूम फिर कर वही लोग सवाल पूछने लगे तो हमें कैसे पता चलेगा? 
क्या आयोग को ऐसे एक्सपर्ट की सूची सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए जो दस सवाल भी ढंग का नहीं पूछ सकते? इन लोगों के शिक्षण पर प्रतिबंध लगाना उचित नहीं है? 
सुनिए! 2011 में उत्तर प्रदेश के दो नौजवानों ने एक साथ चलना शुरू किया था। असित ने लेक्चरर का फार्म भरा और अखिलेश ने विधानसभा का फार्म। असित आज भी वहीं है जहाँ से चला था और अखिलेश के नाम के साथ मुख्यमंत्री लगता है। अखिलेश के परिवार में जितने सदस्य उतनी लाल बत्तियाँ और असित के परिवार में सात लाख बीएड, एक लाख बीपीएड और सत्तर हजार बीटीसी... लेकिन सब के सब बेरोजगार।
याद है न! आज से चार साल पहले लाखों लैपटॉप बाँट दिए गए थे। आगे किसी ने सुधि नहीं ली। दो साल में आईटीआई का कोर्स कंप्लीट हो जाता है तीन साल में बी टेक्। तो अब तक तो उन लाखों लैपटॉप ने लाखों इंजीनियर तैयार कर दिए होंगे न! कहां हैं वो इंजीनियर्स? अच्छा, अगर अगर उनमें से पचास हजार लैपटॉप भी खड़े हो गए कि हमने अपनी पढ़ाई पूरी कर ली है, अब हमें नियोजित कीजिए। तो सरकार का जवाब क्या होगा? 
जितने आईटीआई, बीटेक, आईआईटी, बी एड, बीटीसी, बी ए, एम ए डिग्री होल्डर जमा हो रहे हैं एक जगह, उस जगह जल्दी ही भूकम्प आएगा।यह सभी दलों पार्टियों के लिए चुनौती है। सरकारें ध्यान नहीं दे रहीं हैं लेकिन हम खतरनाक तेजी से खतरनाक दिशा में बढ़ रहे हैं। यह दिशा नक्सलवाद की भी हो सकती है चोरी डकैती अपहरण जालसाजी की भी हो सकती है। अगर आप खुद को विधानसभा की चहारदीवारी में सुरक्षित मान रहे हैं तो बस एक दशक तक। अगले दशक में उत्तर प्रदेश का भूखा शिक्षित नौजवान आपकी राजनीति का वैसे ही बलात्कार करेगा जैसे आज आप जनता का बलात्कार कर रहे हैं। सभी दलों के साथ साथ जनता को भी सोचना होगा इस तरफ कि हम किसे और क्यों चुन रहे हैं? नहीं तो नेताओं के प्रति जिस तरह उत्तर प्रदेश में नकारात्मक छवि बन रही है, वह दिन दूर नहीं जब भीड़ किसी नेता को चौराहे पर पीट पीट कर मार डालेगी और हम फेसबुक पर चर्चा करेंगे कि अगर यह घटना 'एक्सीडेंट' है तो,सौ सलाम और अगर एक्सीडेंट नहीं है तो हजारों सलाम...
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